गरीब के घर पर राजनीति की छत! पंचायत में ‘आवास खेल’ पर बवाल, जिम्मेदार गायब तो पंचायत भवन को ही सुनाया ज्ञापन
400 में से 164 नामों की सूची पर उठे सवाल, पात्र बाहर... अपात्र अंदर! विकास अधिकारी का पद खाली, सुनवाई को तरस रहे ग्रामीण

शाहपुरा संवाद | प्रतापपुरा।
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य गरीब को पक्की छत देना है, लेकिन शाहपुरा पंचायत समिति की प्रतापपुरा ग्राम पंचायत में यही योजना अब सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। गांव में आरोपों का ऐसा तूफान उठा है कि ग्रामीण खुलकर कह रहे हैं—“जिसके सिर पर छत नहीं, उसका नाम सूची से गायब है और जिनके घर पहले से पक्के हैं, वे लाभार्थी बन बैठे हैं।” इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब ग्रामीण अपनी शिकायत लेकर पंचायत भवन पहुंचे तो वहां सुनने वाला कोई जिम्मेदार ही मौजूद नहीं था। मजबूर होकर ग्रामीणों ने अपना ज्ञापन आपस में पढ़ा, पंचायत भवन को सुनाया और आखिर में वार्ड पंच भागचंद जाट को ही सौंप दिया। यह दृश्य किसी व्यंग्य से कम नहीं था, लेकिन हकीकत यही है कि गांवों की प्रशासनिक व्यवस्था अब ऐसे ही सवालों के बीच दम तोड़ती नजर आ रही है।

प्रतापपुरा में प्रधानमंत्री आवास योजना की चयन सूची को लेकर भारी आक्रोश है। ग्रामीणों और वार्ड पंचों का आरोप है कि पूरी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की जगह मनमानी हावी रही। पात्र गरीब परिवारों को सूची से बाहर कर दिया गया, जबकि कई अपात्र लोगों के नाम अंतिम सूची में शामिल कर दिए गए। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल तकनीकी भूल नहीं बल्कि गरीबों के अधिकारों के साथ खुला अन्याय है।
ग्रामीणों के अनुसार पंचायत क्षेत्र से करीब 400 आवेदन जमा हुए थे। उम्मीद थी कि वास्तविक जरूरतमंदों को योजना का लाभ मिलेगा, लेकिन जब अंतिम सूची सामने आई तो उसमें केवल 164 नाम ही शामिल मिले। इससे भी ज्यादा हैरानी इस बात की है कि कई पात्र परिवारों के नाम गायब थे, जबकि कई ऐसे लोगों के नाम सूची में दिखाई दिए जिनकी पात्रता पर पूरे गांव में सवाल उठ रहे हैं। इससे ग्रामीणों में रोष और अविश्वास दोनों बढ़ गए हैं।
सबसे गंभीर आरोप पंचायत के निर्वाचित वार्ड पंचों ने लगाए हैं। शंकरलाल गाडरी, भागचंद जाट और मुकेश जाट का कहना है कि उन्हें सूची तैयार होने की कोई जानकारी नहीं दी गई। न उनसे राय ली गई और न ही किसी बैठक में सूची पर चर्चा हुई। उनका आरोप है कि पूरी प्रक्रिया उनकी गैरमौजूदगी में पूरी कर ली गई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को अंधेरे में रखकर किसके इशारे पर सूची तैयार हुई?
ग्रामीण सांवरा वैष्णव, नूर मोहम्मद खान, नंदलाल गाडरी, रामेश्वर कुम्हार और लोकेश गाडरी का आरोप है कि पंचायत कार्यालय में सचिव और प्रशासनिक अधिकारी नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहते। ग्राम सभा का आयोजन भी लंबे समय से विधिवत नहीं हो रहा है। गांव की संसद कही जाने वाली ग्राम सभा यदि कागजों तक सीमित हो जाए तो फिर गरीब अपनी शिकायत किसके सामने रखे? यही कारण है कि ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है।
प्रतापपुरा का यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शाहपुरा पंचायत समिति क्षेत्र की प्रशासनिक सुस्ती पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। पंचायत समिति में विकास अधिकारी का पद लंबे समय से रिक्त पड़ा है। परिणाम यह है कि पंचायतों की निगरानी कमजोर हो गई है, योजनाओं के क्रियान्वयन पर नियंत्रण घट गया है और शिकायतों का समाधान लगभग ठप पड़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब पंचायत समिति में जिम्मेदार अधिकारी ही नहीं है तो फिर पंचायतों में हो रही गड़बड़ियों पर लगाम कौन लगाएगा?
ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में आयोजित संपर्क शिविर में भी उन्होंने यही मामला प्रशासन के समक्ष उठाया था। उस समय भरोसा दिलाया गया कि शिकायत की जांच होगी और पात्र परिवारों को न्याय मिलेगा, लेकिन कई दिन बीत जाने के बावजूद न जांच शुरू हुई और न कोई कार्रवाई दिखाई दी। इससे ग्रामीणों का प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता जा रहा है।

वार्ड पंच शंकरलाल गाडरी ने बताया कि ज्ञापन में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया गया है कि अनेक पात्र परिवारों के आवेदन बिना पर्याप्त कारण के खारिज कर दिए गए। चयन सूची तैयार करते समय पूरी पारदर्शिता नहीं बरती गई। सूची को सार्वजनिक नहीं किया गया और न ही ग्रामवासियों को इसकी सूचना दी गई। दस्तावेजों के सत्यापन में भी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। कई ऐसे गरीब परिवार, जो योजना के सभी मानदंडों पर खरे उतरते हैं, उन्हें प्राथमिकता नहीं दी गई।
ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रधानमंत्री आवास योजना की अंतिम चयन सूची पंचायत भवन के नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक रूप से चस्पा की जाए तथा ग्राम सभा में पढ़कर सुनाई जाए। जिन परिवारों के आवेदन निरस्त किए गए हैं उनका दोबारा निष्पक्ष सत्यापन कराया जाए। सत्यापन के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों और गांव के दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की मनमानी की गुंजाइश न रहे।
ग्रामीणों ने यह भी मांग रखी है कि यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। जिन वास्तविक पात्र परिवारों को अब तक योजना से वंचित रखा गया है उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सूची में शामिल किया जाए और जिन लोगों को अनुचित तरीके से लाभ मिला है उनके प्रकरणों की दोबारा जांच कर आवश्यक संशोधन किए जाएं।
भविष्य में ऐसी शिकायतें दोबारा न आएं, इसके लिए ग्रामीणों ने पंचायत स्तर पर एक निगरानी समिति गठित करने की मांग की है। इसमें पंचायत प्रतिनिधियों के अलावा महिला प्रतिनिधि, वरिष्ठ नागरिक, निर्वाचित ग्रामीण और तहसील स्तर के अधिकारी को शामिल करने का सुझाव दिया गया है, ताकि चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बन सके।
ग्रामीणों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और सत्याग्रह का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे।
सवाल व्यवस्था से…
प्रधानमंत्री आवास योजना गरीब के सिर पर छत देने का सपना लेकर आई थी, लेकिन यदि चयन सूची ही सवालों के घेरे में हो, पंचायत भवन में जिम्मेदार अधिकारी न मिलें, ग्राम सभाएं नियमित न हों, संपर्क शिविरों में शिकायतें सुनकर भी कार्रवाई न हो और पंचायत समिति में विकास अधिकारी का पद महीनों तक खाली पड़ा रहे, तो फिर यह पूछना लाजिमी है कि आखिर गरीब न्याय की उम्मीद किससे करे?
प्रतापपुरा का यह मामला केवल एक गांव का विवाद नहीं, बल्कि उस ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था का आईना है, जहां योजनाओं के बड़े-बड़े दावे अक्सर फाइलों में चमकते हैं, जबकि गरीब आज भी अपने हिस्से की छत के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।




