बात चुनाव की-पार्टी का झण्डे उठाने वाली महिला कार्यकर्ता देखती रह गई ओर टिकट बंट गए नेताओं के नाते रिश्तेदारों में
कैसे मजबूत होंगा राजनीतिक दलों का महिला संगठन जब टिकट के वक्त बदल जाते चयन के पैमाने

पार्टी का झण्डे उठाने वाली महिला कार्यकर्ता देखती रह गई ओर टिकट बंट गए नेताओं के नाते रिश्तेदारों में
कैसे मजबूत होंगा राजनीतिक दलों का महिला संगठन जब टिकट के वक्त बदल जाते चयन के पैमाने
बात चुनाव की-निलेश कांठेड़
केन्द्र सरकार विधायिका में एक तिहाई सीटे महिलाओं के लिए आरक्षित करने जा रही है, प्रधानमंत्री महिला सशक्तिकरण के लिए नारी शक्ति वंदन अभियान चला रहे है। राजनीतिक दलों के संगठनों में भी महिलाओं को प्रमुख भूमिका दी जा रही है ओर महिला संगठनों को मुख्य अग्रिम संगठन के रूप में जाना जाता है। यहां तक राजनीति में महिला कार्यकर्ताओं की स्थिति सुधरती लगती है लेकिन जब बात पंचायत से लेकर नगर निगम ओर जिला परिषद से लेकर लोकसभा के टिकट की आती है तो महिला कार्यकर्ताओं की पैरेवी करने वाले नेताओं की नजरे ही बदल जाती है। नजर बदल जाती है तो नजारे भी बदल जाते है जो इस बार राजस्थान में नगरीय निकाय चुनावों में खूब देखने में आ रहे है।
निकाय चुनाव में एक तिहाई वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित है ओर राजस्थान में भीलवाड़ा सहित पांच नगर निगमों में महापौर पद भी महिलाओं के लिए आरक्षित है। यहां मुद्दा ये है कि कागजों में महिला आरक्षण तो मिल गया है लेकिन इसका लाभ पाने वाली महिलाएं कौन है। आम बात यहीं होगी कि जो महिला कार्यकर्ता भाजपा व कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों के लिए वर्षो से समर्पित भाव से सेवाएं देती आ रही है ओर हर धरना प्रदर्शन व आंदोलन और बैठक में घर का सारा कार्य छोड़ पार्टी का झंडा उठाकर आगे नजर आती है उनमें से योग्यता के आधार पर प्रत्याशी तय होने चाहिए। राजनीतिक दलों के पदाधिकारी ओर बड़े जनप्रतिनिधि भी महिला मोर्चा के अधिवेशन हो या पार्टी की कोई अन्य बैठक ऐसी ही बात करते है। ये तो सैद्धान्तिक बात है जो सुनने में अच्छी लगती लेकिन इसके प्रेक्टिकल का अवसर अभी नगरीय निकाय चुनाव में आया तो सारी सैद्धान्तिक बाते भाषणों में सिमट कर रह गई।
महिलाओं को उनके लिए तय कानुनी अनुपात से भी कुछ ज्यादा मात्रा में टिकट मिले है लेकिन इनमें से एक बड़ा हिस्सा उन महिलाओं का है जो आज से पहले या यूं कहे पांच साल कभी इन पार्टियों की बैठकों में नजर नहीं आई लेकिन प्रत्याशी बनकर चुनाव मैदान में आ गई है जो पांच साल पार्टी के गुणगान करने में खूब आगे-आगे नजर आती थी उनमें से अधिकतर के हालात दिल के अरमा आंसूओं में बह गई वाली हो चुकी है। वह घर बैेठने के लिए मजबूर है या फिर बगावती तेवर अपना निर्दलीय के रूप में मैदान में है।
नेताओं के परिवार की महिलाएं या परिचित कार्यकर्ता को टिकट देने का विरोध तब नहीं होगा जब वह पहले से राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हो ओर जिनकी स्वतंत्र पहचान है लेकिन उन महिलाओं को टिकट देने का विरोध तो होना ही है जो आज से पहले कभी पार्टियों की बैठकों में नजर नहीं आती थी ओर घर की रसोई से निकल सीधे चुनाव मैदान में वोट मांगने पहुंच गई है। ऐसी अधिकतर महिलाओं की कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है ओर उन्हें अपने बैनर, होर्डिंग हर जगह अपने पुरूष परिजन का फोटो प्रमुखता से लगाना पड़ रहा ह्रै ताकि मतदाता जान सके कि ये उन नेताजी के परिवार से है।
राजनीतिक दलों के इस दोहरे रवैये से तो महिलाएं कभी मजबूत नहीं बन पाएगी ओर वह पुरूष रूपी वैशाखी के सहारे ही राजनीति करने को मजबूर होगी। भाजपा व कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों के केन्द्रीय नेतृत्व ओर प्रदेश नेतृत्व को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि महिला आरक्षण का मतलब नेताओं के घर परिवार या परिचित की महिला परिजन को चुनाव लड़ाना नहीं बल्कि उन योग्य महिला कार्यकर्ताओं को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर देना है जो घर के कामों से अनमोल समय निकाल पार्टी के लिए खून पसीना बहाती है ओर सपना देखती है कि उनकी वर्षो की मेहनत कभी पार्टी के कर्ताधर्ताओं की नजर में आएगी ओर वह भी कभी पार्षद, पंच सरपंच या सभापति, महापौर जैसे पद पा सकेगी।
स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक, भीलवाड़ा
मो.9729537627




