BHILWARAE-Paperक्राइमखेलधर्मराजस्थानरामस्नेहीलोकल न्यूज़शाहपुरा

‘आयुष्मान भवः’ का आठवां संस्करण बना सकारात्मक जीवन की पाठशाला

नवग्रह आश्रम के वैद्य हंसराज चौधरी ने ग्रंथ के जरिए छेड़ी स्वस्थ जीवन की मुहिम | साहित्यकारों ने कहा—आज की तनावपूर्ण जिंदगी में आयुर्वेद की उपयोगिता और बढ़ी

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी।

मंच सजा था… साहित्यकार मौजूद थे… वातावरण में वैदिक मंत्रों की गूंज थी और सामने रखा था एक ऐसा ग्रंथ, जिसमें केवल रोगों के उपचार की बातें नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने का रास्ता तलाशने की कोशिश की गई है। स्वास्तिक की आकृति के बीच वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जैसे ही ‘आयुष्मान भवः—आयुर्वेद’ के आठवें संस्करण का लोकार्पण हुआ, समारोह का माहौल साहित्य से निकलकर स्वास्थ्य और जीवनशैली के सवालों तक पहुंच गया।

यह सिर्फ किसी पुस्तक का लोकार्पण नहीं था। यह उस सोच का सार्वजनिक मंच पर आना था, जिसमें कहा गया कि बीमारी आने के बाद इलाज तलाशने से बेहतर है कि जीवन ऐसा जिया जाए कि बीमारी को आने का मौका ही कम मिले।

श्री नवग्रह आश्रम सेवा संस्थापक वैद्य हंसराज चौधरी की वर्षों की साधना और अनुभवों से तैयार ‘आयुष्मान भवः’ के सात संस्करण पहले ही पुस्तक के रूप में सामने आ चुके हैं। अब आठवें संस्करण को उन्होंने सामान्य पुस्तक से आगे बढ़ाकर ग्रंथ का स्वरूप दिया है। यही वजह रही कि लोकार्पण समारोह में साहित्य और चिकित्सा दोनों की दृष्टियां एक साथ दिखाई दीं।

राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर एवं विनायक विद्यापीठ के तत्वावधान में आयोजित साहित्यकार एवं रचनाकार सम्मेलन के समापन अवसर पर हुए समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों की मौजूदगी रही। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ग्रंथ का लोकार्पण हुआ तो आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों ने इसे आयुर्वेद की परंपरा और साहित्य की अभिव्यक्ति के बीच एक सार्थक संवाद बताया।

चौधरी की बात में इलाज से ज्यादा ‘बचाव’ पर जोर

वैद्य हंसराज चौधरी की बातों का सबसे खास पहलू यही रहा कि उन्होंने आयुर्वेद को केवल बीमारी के उपचार तक सीमित नहीं माना। उनका जोर इस बात पर रहा कि स्वास्थ्य की असली शुरुआत हमारी रसोई, हमारी दिनचर्या और हमारे विचारों से होती है।

लंबे समय से कैंसर सहित विभिन्न रोगों के उपचार और सेवा कार्य से जुड़े चौधरी ने अपने अनुभवों के आधार पर ‘आयुष्मान भवः’ के विभिन्न संस्करण तैयार किए। उनका कहना है कि आयुर्वेद में रोग के उपचार के साथ-साथ जीवन को संतुलित रखने की ऐसी अनेक छोटी-छोटी बातें हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की ओर बढ़ सकता है।

यानी बात बड़ी सीधी है—दवा की दुकान तक पहुंचने से पहले अगर जीवनशैली को संभाल लिया जाए तो शायद कई परेशानियों से बचा जा सकता है।

उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से संयमित खान-पान पर जोर दिया। उम्र बढ़ने के साथ भोजन की मात्रा में कमी करने, तरल आहार को महत्व देने और तनाव से बचने की सलाह दी। उनका कहना रहा कि शरीर की उम्र बढ़ती है तो भोजन और दिनचर्या को भी उसी के अनुरूप बदलना जरूरी है।

उन्होंने शक्कर और गेहूं के अत्यधिक सेवन से बचने की बात भी कही। उनका संदेश स्पष्ट था कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं, बल्कि क्या, कितना और कब खाया जाए, यह समझना भी जरूरी है।

तनाव… आज की सबसे बड़ी बीमारी?

समारोह में सबसे ज्यादा जोर जिस बात पर दिखाई दिया, वह था—तनाव से बचना।

आज की भागदौड़ में व्यक्ति के पास सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन मन का सुकून घटता जा रहा है। मोबाइल, सोशल मीडिया, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली ने तनाव को सामान्य जीवन का हिस्सा बना दिया है।

वैद्य चौधरी का संदेश इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका मानना है कि शरीर के साथ मन को स्वस्थ रखना भी जरूरी है। व्यक्ति लगातार तनाव में रहेगा तो स्वस्थ जीवन की कल्पना अधूरी रह जाएगी।

इसी सोच को उन्होंने साहित्य से भी जोड़ दिया। उन्होंने साहित्यकारों से आह्वान किया कि ऐसी रचनाएं सामने आनी चाहिए जो मानव जीवन को तनावमुक्त करें, सकारात्मक सोच पैदा करें और नई पीढ़ी के बाल मन में ऊर्जा एवं संस्कारों का संचार करें।

यानी साहित्य केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली शक्ति भी बने।

नवग्रह आश्रम—इलाज से आगे सेवा और सकारात्मकता का केंद्र

वैद्य हंसराज चौधरी की सोच का विस्तार श्री नवग्रह आश्रम की गतिविधियों में भी दिखाई देता है। आश्रम उनके लिए केवल उपचार का स्थान नहीं, बल्कि सेवा, जागरूकता और सकारात्मक वातावरण निर्माण का माध्यम है।

यहां स्वास्थ्य को केवल शरीर तक सीमित करके नहीं देखा जाता। व्यक्ति का मन, उसका वातावरण, उसकी जीवनशैली और उसके आसपास का सकारात्मक माहौल भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

यही वजह है कि ‘आयुष्मान भवः’ को ग्रंथ का रूप देना भी एक तरह से उसी अभियान का विस्तार है। जो बातें आश्रम में सेवा और अनुभव के माध्यम से सामने आती हैं, उन्हें शब्दों के माध्यम से समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।

साहित्यकारों ने भी माना—समय आयुर्वेद को समझने का

समारोह में मौजूद साहित्यकारों ने ‘आयुष्मान भवः’ में संकलित सामग्री को मानव जीवन के लिए उपयोगी बताया। उनका कहना था कि बदलते खान-पान और जीवनशैली के दौर में आयुर्वेद का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष राजेंद्र ओसवाल, प्रांतीय अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह राव, वरिष्ठ साहित्यकार उदय किरोला, डॉ. भेरूलाल गर्ग, श्याम पलट पांडेय, उमेश चौरसिया, डॉ. नीरज दइया, मुकेश नोटियाल, डॉ. मोहम्मद साजिद खान, कुसुम अग्रवाल, यशपाल शर्मा, रेखा लोढ़ा सहित अनेक साहित्यकार मौजूद रहे।

नगर विकास न्यास भीलवाड़ा के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण डाड सहित अन्य अतिथियों की मौजूदगी में हुए आयोजन में राजस्थान के करीब डेढ़ दर्जन जिलों के अलावा अन्य राज्यों से भी साहित्यकार पहुंचे।

समारोह में 10 राज्यों के 13 साहित्यकारों का आयोजन समिति की ओर से सम्मान किया गया।

आठवां संस्करण क्यों खास?

सात संस्करणों तक ‘आयुष्मान भवः’ एक पुस्तक के रूप में पाठकों तक पहुंचता रहा। आठवें संस्करण में इसे ग्रंथ का आकार दिया गया है। वैद्य चौधरी के अनुसार इसके पीछे उद्देश्य केवल आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि आयुर्वेद के ज्ञान के प्रति सम्मान और रुचि को बढ़ाना भी है।

एक तरफ साहित्यकारों की रचनात्मक दुनिया और दूसरी तरफ आयुर्वेद का अनुभवजन्य ज्ञान—दोनों का मिलन इस आयोजन की खासियत रहा।

लोकार्पण के दौरान ऐसा लगा मानो मंच से एक ही संदेश निकल रहा हो—स्वस्थ रहना केवल डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं, यह व्यक्ति की अपनी जीवनशैली का भी परिणाम है।

और शायद यही ‘आयुष्मान भवः’ की सबसे बड़ी उपयोगिता है।

क्योंकि आज जब बीमारी का इलाज खोजने के लिए अस्पतालों की कतार लंबी होती जा रही है, तब अगर कोई व्यक्ति भोजन में संयम, विचारों में सकारात्मकता, दिनचर्या में अनुशासन और जीवन में तनाव कम करने की बात करता है तो उसे सुनना भी जरूरी है।

नवग्रह आश्रम की सेवा भावना और वैद्य हंसराज चौधरी की आयुर्वेद आधारित जीवन-दृष्टि इसी दिशा में एक सकारात्मक प्रयास के रूप में सामने आई है।

संदेश साफ है—आयुर्वेद केवल बीमारी के समय याद करने की पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की संस्कृति बन सकता है।

और ‘आयुष्मान भवः’ का आठवां संस्करण इसी संस्कृति को शब्दों में संजोकर समाज तक पहुंचाने की कोशिश है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!