
शाहपुरा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, शाहपुर नगर की ओर से संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित नाट्य समारोह में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार एडवोकेट दीपक पारीक ने एकल अभिनय ‘चौकीदार’ के जरिए परम पूज्य गुरुजी माधवराव सदाशिव गोलवलकर के जीवन, विचारों और कार्यशैली को मंच पर जीवंत कर दिया। रंगकर्मी रामप्रसाद पारीक के निर्देशन में हुई इस प्रभावशाली प्रस्तुति ने दर्शकों को न केवल बांधे रखा, बल्कि उन्हें गुरुजी के व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण के विचारों से रूबरू कराया।
‘चौकीदार’ के पात्र को केंद्र में रखकर तैयार किए गए नाटक में गुरुजी के जीवन-दर्शन, चिंतन, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण को संवेदनशील अंदाज में प्रस्तुत किया गया। मंच पर कलाकार की आवाज, संवाद अदायगी, हाव-भाव और अभिनय के उतार-चढ़ाव ने ऐसा प्रभाव पैदा किया कि कुछ ही देर में सभागार का माहौल पूरी तरह नाट्य कथा में डूब गया।

एक पात्र, अनेक भाव और पूरा सभागार मंत्रमुग्ध
एडवोकेट दीपक पारीक की प्रस्तुति की सबसे बड़ी खासियत उनका एकल अभिनय रहा। उन्होंने एक ही पात्र के माध्यम से विभिन्न परिस्थितियों, भावनाओं और विचारों को इतनी सहजता और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया कि दर्शक पूरे समय कथा से जुड़े रहे।
दमदार संवादों के साथ भावपूर्ण अभिनय और शारीरिक हाव-भाव ने प्रस्तुति को प्रभावी बनाया। मंच पर कलाकार की मौजूदगी इतनी सशक्त रही कि कई क्षणों में सभागार में गहरी खामोशी छा गई। दर्शकों की एकाग्रता ही प्रस्तुति के प्रभाव की कहानी कह रही थी।
‘चौकीदार’ के जरिए सामने आया गुरुजी का विचार संसार
नाटक में गुरुजी के उस विचार को विशेष रूप से उभारा गया कि संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला है। ऐसी प्रयोगशाला, जहां व्यक्ति के भीतर अनुशासन, राष्ट्रभाव, सेवा, त्याग और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे गुणों का विकास होता है।
‘चौकीदार’ के चरित्र और संवादों के माध्यम से इसी विचार को दर्शकों तक पहुंचाया गया। नाटक ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि राष्ट्र निर्माण केवल सत्ता के केंद्रों से नहीं होता, बल्कि समाज के भीतर तैयार होने वाले जागरूक, अनुशासित और जिम्मेदार व्यक्तित्व भी उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सत्ता से दूर रहकर संगठन निर्माण की कार्यशैली
प्रस्तुति के दौरान गुरुजी के व्यक्तित्व के उस पक्ष को भी सामने रखा गया, जिसमें संगठन निर्माण और समाज जीवन में वैचारिक चेतना को महत्वपूर्ण माना गया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि व्यक्ति की महानता केवल सत्ता, वैभव अथवा पद से तय नहीं होती, बल्कि विचार, त्याग, अनुशासन और समाज के प्रति समर्पण से होती है।
नाटक के माध्यम से दर्शकों को उस दौर की झलक भी मिली, जब गुरुजी अपने विचारों और संगठनात्मक कार्यशैली के माध्यम से समाज जीवन में नई चेतना के निर्माण में जुटे थे। मंचीय प्रस्तुति ने इतिहास और वर्तमान के बीच एक भावनात्मक सेतु का काम किया।
मौन सभागार ने बताई प्रस्तुति की ताकत
नाटक के दौरान सभागार में दर्शकों की एकाग्रता देखते ही बनती थी। कलाकार के संवाद शुरू होते ही दर्शक पूरी तरह मंच की ओर केंद्रित हो गए। कई भावपूर्ण दृश्यों में ऐसा मौन पसरा कि कलाकार की आवाज स्पष्ट रूप से पूरे सभागार में गूंजती रही।
प्रस्तुति समाप्त होते ही दर्शकों ने जोरदार तालियों के साथ कलाकार का उत्साहवर्धन किया। तालियों की गूंज ने कार्यक्रम की सफलता पर मुहर लगा दी।
नई पीढ़ी तक विचार पहुंचाने का प्रयास
‘चौकीदार’ को केवल मनोरंजनपरक नाटक के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि यह गुरुजी के जीवन, विचार और राष्ट्रभाव को मंचीय माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी रहा। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने कला और विचार को एक मंच पर लाने का काम किया।
नाटक ने यह संदेश भी दिया कि समाज निर्माण की प्रक्रिया केवल बड़े मंचों या सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं है। व्यक्ति के चरित्र, अनुशासन, सेवा भावना और सामाजिक जिम्मेदारी से ही व्यापक परिवर्तन की नींव रखी जा सकती है।
आयोजकों ने जताया आभार
कार्यक्रम के अंत में नगर के कन्हैया लाल ने उपस्थित अतिथियों, कलाकारों, आयोजकों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता के लिए सभी सहयोगियों को धन्यवाद दिया।
शाहपुरा में आयोजित यह नाट्य समारोह लंबे समय तक दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना रहा। ‘चौकीदार’ ने एकल अभिनय की शक्ति के साथ गुरुजी के जीवन-दर्शन, राष्ट्रभाव और व्यक्तित्व निर्माण के विचारों को मंच पर प्रभावशाली ढंग से उतारा। यही इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।




