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रामनिवास धाम : जहाँ अध्यात्म और शिल्प सौंदर्य एक-दूसरे को देते हैं चुनौती

रामस्नेही संप्रदाय की विश्वपीठ पर हर पत्थर सुनाता है तप, त्याग और भक्ति की अमर गाथा

संगमरमर की 108 स्तंभों वाली बारहदरी, 84 द्वार, रंग-बिरंगा छत्रमहल और दिव्य समाधि… शाहपुरा का यह धाम केवल तीर्थ नहीं, भारतीय स्थापत्य का जीवंत वैभव है

 

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी

राजस्थान की धरती पर अनेक ऐसे तीर्थ हैं, जहाँ आस्था के साथ इतिहास भी सांस लेता है। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा स्थित रामस्नेही संप्रदाय की विश्वपीठ श्रीरामनिवास धाम उन्हीं विरले स्थलों में से एक है, जहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता है मानो अध्यात्म और शिल्पकला ने एक-दूसरे से श्रेष्ठ बनने की होड़ लगा रखी हो। यहाँ का हर पत्थर, हर स्तंभ, हर छतरी और हर नक्काशी केवल स्थापत्य कला का नमूना नहीं, बल्कि संत परंपरा, तपस्या और गुरु-भक्ति की मौन गाथा सुनाती है।

देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु जब रामनिवास धाम के मुख्य प्रवेश द्वार सूरजपोल के सामने पहुँचते हैं, तो उनकी दृष्टि सबसे पहले पाँच भव्य संगमरमर की छतरियों पर ठहर जाती है। सफेद, काले और दूधिया संगमरमर से निर्मित इन छतरियों पर काँच, रंगीन टाइल्स और पारंपरिक चित्रांकन की ऐसी बारीक कलाकारी की गई है कि दर्शक बरबस ही उन्हें निहारते रह जाते हैं। सूरजपोल केवल प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संसार में प्रवेश का प्रतीक प्रतीत होता है।

सूरजपोल से भीतर प्रवेश करते ही सामने एक प्राचीन कक्ष दिखाई देता है, जिसके दोनों ओर संगमरमर की सीढ़ियाँ ऊपर स्थित विश्वविख्यात बारहदरी तक ले जाती हैं। यही वह स्थल है, जो रामनिवास धाम की सबसे बड़ी पहचान है। एक ही आधार पर खड़ी इस भव्य बारहदरी में 108 स्तंभ और 84 द्वार निर्मित हैं। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इन दोनों संख्याओं का विशेष महत्व माना जाता है और यही प्रतीकात्मकता इस स्थापत्य को अद्वितीय बनाती है।

बारहदरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके विशाल स्तंभों और पत्थरों को देखकर कहीं भी चूना या सीमेंट का प्रयोग दिखाई नहीं देता। ऐसा प्रतीत होता है मानो एक-एक पत्थर स्वयं दूसरे पत्थर से जुड़ गया हो। सदियों पुरानी यह स्थापत्य कला आज भी इंजीनियरों और वास्तु विशेषज्ञों के लिए आश्चर्य का विषय बनी हुई है।

इसी बारहदरी के नीचे स्थित है रामस्नेही संप्रदाय के आद्य संस्थापक महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की पावन समाधि। तीन परिक्रमाओं से युक्त यह समाधि आध्यात्मिक श्रद्धा और स्थापत्य सौंदर्य का अद्भुत संगम है। संगमरमर की महीन नक्काशी, स्तंभों की अनुपम बनावट और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।

बारहदरी के मध्य स्थापित गादी एवं पादुकाएँ संप्रदाय की गुरु-परंपरा की जीवंत प्रतीक हैं। आज भी विशेष अवसरों पर यहीं से पीठाधीश्वर प्रवचन देते हैं और गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हैं। एक विशेष धार्मिक परंपरा के अनुसार संध्या आरती के बाद इस स्थल पर महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध रहता है। यह परंपरा आज भी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जाती है।

बारहदरी के नीचे स्थित अष्टकोणीय रामधाम श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। यहीं महाप्रभु की समाधि स्थित है, जहाँ प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन कर अपनी मनोकामनाएँ व्यक्त करते हैं। कोई परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करता है, तो कोई जीवन में शांति और सफलता का आशीर्वाद मांगता है। श्रद्धालु यहाँ श्रद्धानुसार चढ़ावा अर्पित कर अपने जीवन की नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं।

दूर से देखने पर बारहदरी और उसके ऊपर स्थित छत्रमहल का दृश्य किसी शांत जलाशय में तैरते भव्य जहाज़ जैसा प्रतीत होता है। यही दृश्य रामनिवास धाम की सबसे अधिक चर्चित पहचान बन चुका है।

बारहदरी के दाहिनी ओर स्थित लाल चौक भी धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ स्थित छतरी को श्री भंडार, वाणीजी तथा महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की तपोस्थली के रूप में पूजा जाता है। लाल चौक के सामने स्थित आसन छतरी, जिसे न्यायस्थल भी कहा जाता है, संप्रदाय की प्राचीन निर्णय परंपरा की साक्षी रही है।

धाम के मध्य स्थित कँवरपदा की छतरी का विशेष महत्व है। यही वह पावन स्थान है, जहाँ आज भी नए संतों को दीक्षा प्रदान की जाती है। अनेक परिवार अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर अपने पुत्रों को संत जीवन के लिए समर्पित करते हैं। यह परंपरा रामस्नेही संप्रदाय में त्याग, सेवा और समर्पण की जीवंत मिसाल मानी जाती है।

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है कि महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज भक्त प्रह्लाद के अवतार थे। संप्रदाय के प्राचीन ‘गुरुस्तुति’ ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि रामनिवास धाम केवल स्थापत्य का केंद्र नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का ध्रुवतारा भी है।

यदि रामनिवास धाम का सबसे मनोहारी भाग किसी को कहा जाए, तो वह है छत्रमहल। सोलह कलात्मक छतरियों से सुसज्जित इस भव्य संरचना की दीवारों और छतों पर जड़ी रंग-बिरंगी टाइल्स, काँच की नक्काशी और राम-नाम की कलात्मक अभिव्यक्तियाँ इसे अनुपम बनाती हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय इन टाइल्स पर पड़ने वाली किरणें पूरे परिसर को अलौकिक आभा से भर देती हैं। कला प्रेमी, स्थापत्य विशेषज्ञ और पर्यटक इस दृश्य को कैमरे में कैद किए बिना नहीं रह पाते।

छत्रमहल के समीप स्थित पूर्ववर्ती आचार्यों के स्मारक और ब्रह्मलीन संतों की छतरियाँ श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा के प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ का वातावरण साधना, वैराग्य और गुरु-भक्ति की अनुभूति कराता है।

हर वर्ष होलिका दहन के बाद जब रामस्नेही संप्रदाय का विश्वप्रसिद्ध फूलडोल महोत्सव आरंभ होता है, तब रामनिवास धाम आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हो उठता है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। भजन, सत्संग, अणभैवाणी की शोभायात्राएँ और संतों के प्रवचन पूरे वातावरण को राममय बना देते हैं। गर्मी के मौसम में बारहदरी और छत्रमहल की स्वाभाविक शीतलता स्थानीय लोगों और आगंतुकों को विशेष सुकून प्रदान करती है।

रामनिवास धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा, राजस्थानी शिल्पकला और आध्यात्मिक चेतना का ऐसा जीवंत स्मारक है, जहाँ पहुँचकर हर आगंतुक यही अनुभव करता है कि यहाँ पत्थर भी बोलते हैं, स्तंभ भी साधना करते हैं और हर शिल्प राम-नाम का संदेश देता है।

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