शाहपुरा में कांग्रेस का ‘कमबैक’, भाजपा का ट्रिपल इंजन बेपटरी
35 में कांग्रेस 22, भाजपा 8 और निर्दलीय 5 पर सिमटे... शाहपुरा में कांग्रेस का बोर्ड बनना तय

विधायक भाजपा के, सरकार भाजपा की… फिर भी पालिका की सत्ता कांग्रेस के हाथ; विकास के दावे और संगठन की रणनीति पर उठे सवाल
शाहपुरा।
शाहपुरा नगर पालिका चुनाव 2026 के नतीजों ने शहर की राजनीति का पूरा गणित बदल दिया है। 35 वार्डों वाली नगर पालिका में कांग्रेस ने 22 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा महज 8 वार्डों तक सिमट गई। पांच वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने बाजी मारकर अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास करा दिया। नतीजा साफ है—शाहपुरा नगर पालिका में कांग्रेस का बोर्ड बनना लगभग तय हो गया है।
सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर यह है कि शाहपुरा में विधायक भाजपा के डॉ. लालाराम बैरवा हैं और प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है। इसके बावजूद नगर पालिका की सत्ता कांग्रेस के खाते में चली गई। ऐसे में यह चुनाव महज पार्षदों की जीत-हार नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में जनता के मूड, संगठन की पकड़, प्रत्याशी चयन और मुद्दों की दिशा का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
कांग्रेस के नगर अध्यक्ष रमेश सेन ने परिणाम के बाद इसे जनता का फैसला बताते हुए कहा कि “जनता ने भाजपा के ट्रिपल इंजन को पंक्चर कर दिया।” भाजपा की ओर से अभी कोई अधिकृत विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चुनाव परिणामों की समीक्षा और भविष्य की रणनीति को लेकर मंथन शुरू हो गया है।

पहले राउंड से कांग्रेस की बढ़त, आखिरी राउंड तक कायम रहा दबदबा
मतगणना राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के पुस्तकालय भवन में रिटर्निंग अधिकारी बनवारीलाल सिनसिनवार की देखरेख में हुई। सात टेबलों पर पांच राउंड में 35 वार्डों की ईवीएम से मतों की गणना की गई। सबसे पहले डाक मतपत्रों की गणना हुई, इसके बाद ईवीएम के मतों की राउंडवार गिनती कर परिणाम घोषित किए गए।मतगणना शुरू होते ही कांग्रेस ने बढ़त बनानी शुरू कर दी। एक-एक करके वार्डों के परिणाम सामने आते गए और कांग्रेस का आंकड़ा बढ़ता गया। खास बात यह रही कि कांग्रेस की बढ़त केवल शुरुआती दौर की लहर नहीं रही, बल्कि पांचवें और अंतिम राउंड तक कायम रही। जैसे-जैसे कांग्रेस की सीटें बढ़ती गईं, पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह भी बढ़ता गया। अंतिम परिणाम सामने आने के बाद कांग्रेस समर्थकों ने त्रिमूर्ति चौराहे से सदर बाजार होते हुए बालाजी की छतरी तक विजय जुलूस निकाला। आतिशबाजी और नारेबाजी के बीच कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाया।
विकास का मुद्दा लेकर मैदान में उतरी भाजपा, लेकिन वोट में नहीं बदल पाया नैरेटिव
भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों को प्रमुख आधार बनाया था। सत्ता में भाजपा होने और स्थानीय विधायक भी भाजपा के होने का लाभ पार्टी को मिलने की उम्मीद थी। राजनीतिक गलियारों में इसे ‘डबल इंजन’ से आगे ‘ट्रिपल इंजन’ वाली ताकत के रूप में भी प्रचारित किया गया। लेकिन चुनाव परिणामों ने भाजपा के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विकास कार्यों की जानकारी और उनका राजनीतिक संदेश संगठन घर-घर तक पहुंचा पाया? परिणामों को देखें तो भाजपा के कई प्रमुख चेहरे चुनाव हार गए। नगर अध्यक्ष पंकज सुगंधी, महामंत्री सीताराम बैरवा सहित कई अनुभवी और पूर्व पार्षदों को मतदाताओं ने इस बार विपक्ष में बैठा दिया। यानी सवाल सिर्फ हार का नहीं है। सवाल यह भी है कि सरकार की उपलब्धियों को स्थानीय चुनावी मुद्दे में बदलने में संगठन कहां चूक गया?
‘जिला बचाओ’ आंदोलन की छाया भी चुनाव परिणामों में दिखी
शाहपुरा को जिला बनाए रखने अथवा जिला बहाली की मांग पिछले लंबे समय से यहां की राजनीति का बड़ा मुद्दा रही है। चुनाव के दौरान भी यह मुद्दा पूरी तरह गायब नहीं हुआ। भाजपा के प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि शाहपुरा जिला हटाए जाने के फैसले और उसके बाद चले जिला बहाली आंदोलन की नाराजगी का असर भी भाजपा के पक्ष में वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकता है। हालांकि किसी एक मुद्दे को पूरे परिणाम का कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन शाहपुरा की राजनीतिक जमीन पर जिला बहाली का सवाल इतना बड़ा रहा है कि चुनावी गणित में इसकी अनदेखी भी मुश्किल है। विशेषकर वार्ड 20 में जिला बहाल संघर्ष समिति के अध्यक्ष दुर्गालाल राजौरा का मैदान में होना चुनाव को अलग राजनीतिक रंग देता नजर आया। ऐसे कई मुकाबले रहे जहां स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों ने दलों के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती दी।
वार्डवार नतीजों ने भी खोली राजनीति की कई परतें
वार्ड 1 से 5 : शुरुआत में ही कांग्रेस का दबदबा
वार्ड 1 में कांग्रेस की तबस्सुम बानो ने 115 मतों से जीत दर्ज की। वार्ड 2 में कांग्रेस के युवराज रेगर ने भाजपा के महामंत्री सीताराम बैरवा को 271 मतों से हराकर बड़ा उलटफेर किया। वार्ड 3 में जाकिर हुसैन देशवाली ने 160 मतों से जीत हासिल की। वार्ड 4 में निर्दलीय चांद मोहम्मद रंगरेज ने महज 8 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर मुकाबले की नजदीकी बता दी। वार्ड 5 में निर्दलीय एसडीएफआई के युसूफ मोहम्मद ने 83 मतों से जीत हासिल की। पहले पांच वार्डों ने ही संकेत दे दिया था कि इस बार चुनाव पारंपरिक भाजपा-कांग्रेस मुकाबले से आगे निकलने वाला है।
वार्ड 6 से 10 : कांग्रेस ने मजबूत की पकड़
वार्ड 6 में कांग्रेस के पूर्व पालिका उपाध्यक्ष नमन ओझा ने भाजपा के तीन बार के पार्षद स्वराजसिंह को 163 मतों से हराया। वार्ड 7 में भाजपा के जिला मंत्री राजेंद्र कुमार बोहरा ने कांग्रेस के अमन ओझा को 61 मतों से हराकर पार्टी की उम्मीद कायम रखी।वार्ड 8 में कांग्रेस की पूर्व पार्षद मधु देवी सर्वा ने 161 मतों से, वार्ड 9 में रचना सुनील मिश्रा ने 81 मतों से और वार्ड 10 में कांग्रेस के पूर्व पार्षद नाथूलाल कोली ने 128 मतों से जीत हासिल की।
वार्ड 11 : नगर अध्यक्ष हारे, निर्दलीय ने मारी बाजी
वार्ड 11 का परिणाम भाजपा के लिए खासा झटका माना जाएगा। यहां निवर्तमान पार्षद निर्दलीय योगेश कुमार पारीक ने 116 मतों से जीत दर्ज की।उनके सामने भाजपा के नगर अध्यक्ष पंकज सुगंधी और कांग्रेस के सुशील गोड जैसे प्रमुख चेहरे थे।यह परिणाम बताता है कि स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी के पद से ज्यादा व्यक्तिगत पकड़ और वार्ड की राजनीति प्रभावी हो सकती है।
वार्ड 12 से 18 : कांग्रेस का लगातार दबदबा
वार्ड 12 में कांग्रेस की भावना सेन ने 95 मतों से जीत दर्ज की। वार्ड 13 में रेखा देवी 153 मतों से विजयी रहीं।वार्ड 14 भाजपा के सुरेश कुमार कहार के नाम रहा। उन्होंने 188 मतों से जीत दर्ज की।इसके बाद वार्ड 15 में कांग्रेस के नगर अध्यक्ष रमेश कुमार सेन ने 201 मतों से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। वार्ड 16 में पूर्व नगर अध्यक्ष बालमुकुंद तोषनीवाल 193 मतों से विजयी रहे।वार्ड 17 में कांग्रेस के किशन लाल कहार ने 180 और वार्ड 18 में लादूलाल खटीक ने 107 मतों से जीत हासिल की।
वार्ड 19 से 23 : कांग्रेस की लहर और भाजपा के लिए चुनौतियां
वार्ड 19 में कांग्रेस की ममता चावला ने 214 मतों से जीत हासिल की।वार्ड 20 में पूर्व पालिका अध्यक्ष अनिल चौधरी के पुत्र शनिल चौधरी ने 186 मतों से जीत दर्ज की। इस वार्ड में भाजपा के महामंत्री रहे महावीर सैनी और जिला बहाल संघर्ष समिति के अध्यक्ष दुर्गालाल राजौरा की मौजूदगी ने मुकाबले को खासा राजनीतिक बना दिया था।वार्ड 21 में भाजपा की निरमा देवी ने 241 मतों से जीत दर्ज की। वार्ड 22 में भाजपा के प्रवीण कुमार स्वर्णकार ‘भैया’ 242 मतों से विजयी रहे।वार्ड 23 में कांग्रेस की पूर्व पालिका उपाध्यक्ष मधु पोंड्रिक ने 171 मतों से जीत दर्ज की।
वार्ड 24 : निर्दलीय ने भाजपा-कांग्रेस दोनों को पछाड़ा
वार्ड 24 का मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहा। अंबेडकर विचार मंच के अध्यक्ष निर्दलीय सुरेश चंद्र घूसर ने 129 मतों से जीत हासिल की।उनके सामने भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपाल घूसर और कांग्रेस के परमेश्वर धोबी सहित अन्य प्रत्याशी थे।यह परिणाम इस बात का संकेत है कि शाहपुरा के मतदाता कई वार्डों में पार्टी के बजाय चेहरे और स्थानीय समीकरणों पर भी वोट कर रहे थे।
वार्ड 25 में भाजपा ने बचाई प्रतिष्ठा
वार्ड 25 भाजपा के वरिष्ठ नेता मोहनलाल गुर्जर के खाते में गया। उन्होंने 84 मतों से जीत दर्ज की।हालांकि यहां भी मुकाबला आसान नहीं था। कांग्रेस के पूर्व पार्षद ओमप्रकाश सेन, भाजपा के बागी जोगेंद्र सिंह और निर्दलीय प्रत्याशी के कारण मुकाबला त्रिकोणीय से ज्यादा कोणों वाला हो गया था।
वार्ड 26 से 27 : कांग्रेस ने फिर बनाई बढ़त
वार्ड 26 में कांग्रेस के पूर्व पार्षद डॉ. मोहम्मद इशाक ने 164 मतों से जीत दर्ज की। वार्ड 27 में कांग्रेस की शमीम बानू ने 227 मतों से भाजपा की सुषमा धाकड़ को शिकस्त दी।यहां तक पहुंचते-पहुंचते कांग्रेस के पक्ष में बोर्ड बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा लगभग पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था।
वार्ड 28 : भाजपा की सबसे बड़ी जीत
पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड 28 के परिणाम की रही।भाजपा के नारायण कहार ने कांग्रेस के महेंद्र कहार और दो निर्दलीय प्रत्याशियों को पछाड़ते हुए 308 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की।यह 35 वार्डों में सबसे बड़ा जीत अंतर रहा।ऐसे परिणाम भाजपा के लिए यह उम्मीद जरूर जगाते हैं कि पार्टी के पास अभी भी कुछ वार्डों में मजबूत संगठन और व्यक्तिगत जनाधार कायम है।
वार्ड 29 से 35 : कांग्रेस ने जीत का आंकड़ा 22 तक पहुंचाया
वार्ड 29 में भाजपा की ललिता कहार ने 136 मतों से जीत दर्ज की।वार्ड 30 में निर्दलीय राजूलाल कहार ने 83 मतों से जीत हासिल की।वार्ड 31 में कांग्रेस के चेतन कुमार रैगर ने 278 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की।वार्ड 32 में कांग्रेस की शांति देवी कहार ‘पप्पू’ ने 211 मतों से जीत हासिल की।वार्ड 33 में भाजपा की दीपिका वैष्णव ने 133 मतों से जीत दर्ज की।वार्ड 34 में कांग्रेस के यूनुस खान कायमखानी 129 मतों से विजयी रहे। यहां भाजपा, आरएलपी और निर्दलीय प्रत्याशी भी मैदान में थे।वार्ड 35 में कांग्रेस के विशाल बाबू मीना ने 150 मतों से जीत दर्ज कर कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 22 तक पहुंचा दिया।
आंकड़ों की जुबानी पूरी कहानी
कुल वार्ड — 35 कांग्रेस — 22 भाजपा — 8 निर्दलीय — 5
बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा 18 था। कांग्रेस ने इससे चार सीट ज्यादा हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया। इसलिए अब बोर्ड गठन को लेकर किसी जोड़-तोड़ की जरूरत कांग्रेस को नहीं है। कांग्रेस के पास अपने दम पर बोर्ड बनाने के लिए पर्याप्त संख्या है।यही इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल—कहां चूकी रणनीति?
भाजपा के पास सत्ता की ताकत थी। विधायक भाजपा के थे। प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। विकास कार्यों को लेकर पार्टी के पास अपने पक्ष में बताने के लिए मुद्दे भी थे।
फिर 35 में से केवल 8 सीटें क्यों?
यही सवाल अब भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा में रहेगा।
क्या प्रत्याशी चयन में चूक हुई?
क्या गुटबाजी भारी पड़ी?
क्या पार्टी का संगठन घर-घर तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाया?
क्या जिला बहाली का मुद्दा मतदाताओं की नाराजगी में बदल गया?
या फिर कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर भाजपा से बेहतर चुनाव प्रबंधन किया?
इन सवालों के जवाब अब भाजपा की समीक्षा बैठक में तलाशे जाएंगे।
कांग्रेस की जीत सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक संदेश भी
कांग्रेस के लिए यह परिणाम लंबे समय बाद शाहपुरा की स्थानीय राजनीति में बड़ी वापसी है। 22 पार्षदों के साथ कांग्रेस ने केवल बहुमत नहीं पाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि स्थानीय निकाय चुनाव में सत्ता से ज्यादा संगठन, प्रत्याशी और वार्ड स्तर का समीकरण महत्वपूर्ण होता है। कांग्रेस अब इस जीत को जनता की जीत बताकर राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में जुटेगी। नगर कांग्रेस अध्यक्ष रमेश सेन सहित कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जनता ने भाजपा के कथित ‘ट्रिपल इंजन’ को नकार दिया है।
निर्दलीयों ने भी दिखाई अपनी ताकत
पांच निर्दलीय प्रत्याशियों की जीत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वार्ड 4, 5, 11, 24 और 30 में निर्दलीयों की जीत ने साफ कर दिया कि शाहपुरा के मतदाता हर जगह पार्टी लाइन पर नहीं चले।यह परिणाम आने वाले समय में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चेतावनी भी है कि वार्ड स्तर पर मजबूत व्यक्तिगत जनाधार रखने वाले प्रत्याशियों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
अब असली राजनीति बोर्ड बनने के बाद शुरू होगी
चुनाव परिणाम घोषित हो चुके हैं, लेकिन शाहपुरा की राजनीति में कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
अब नजर रहेगी—नगर पालिका अध्यक्ष कौन बनेगा? कांग्रेस किस चेहरे पर दांव लगाएगी? क्या निर्वाचित पार्षदों में अध्यक्ष पद को लेकर सहमति आसानी से बनेगी?
कांग्रेस के पास 22 पार्षद हैं, इसलिए अध्यक्ष पद के लिए संख्या की समस्या नहीं है। लेकिन राजनीति में केवल संख्या पर्याप्त नहीं होती—चेहरा, गुट, जातीय समीकरण, वरिष्ठता और संगठन की पसंद भी मायने रखती है। इसलिए अब शाहपुरा में चुनाव परिणाम के बाद अगली राजनीतिक पटकथा पालिका अध्यक्ष के नाम पर लिखी जाएगी।
शाहपुरा की जनता ने क्या संदेश दिया?
निकाय चुनाव का जनादेश कई संदेश लेकर आया है।
पहला—स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति पर भारी पड़ सकते हैं। दूसरा—सत्ता में होना जीत की गारंटी नहीं है। तीसरा—विकास कार्य तभी राजनीतिक पूंजी बनते हैं, जब उनका संदेश जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। चौथा—व्यक्तिगत जनाधार रखने वाले निर्दलीय और बागी प्रत्याशी दलों का गणित बिगाड़ सकते हैं। और पांचवां सबसे बड़ा संदेश—शाहपुरा की जनता ने नगर पालिका की सत्ता की चाबी कांग्रेस को सौंप दी है।
अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस जनादेश को केवल विजय जुलूस तक सीमित न रखकर सुशासन, विकास और शहर की समस्याओं के समाधान में बदलने की होगी।वहीं भाजपा के सामने इस हार को केवल हार मानने के बजाय संगठन की कमजोर कड़ियों को तलाशने और अगले राजनीतिक मुकाबले के लिए नई रणनीति तैयार करने की चुनौती है।कुल मिलाकर शाहपुरा नगर पालिका चुनाव 2026 ने शहर की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है।विधायक भाजपा के, सरकार भाजपा की… लेकिन पालिका की सत्ता कांग्रेस की।यही शाहपुरा के इस चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे चटखारा देने वाला राजनीतिक निष्कर्ष है।




