गुरु ही गढ़ता है राष्ट्र का भविष्य :भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षक की महिमा पर हुआ मंथन
प्रतापसिंह बारहठ राजकीय महाविद्यालय में 'गुरु वंदन' कार्यक्रम

मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा संवाद। “गुरु केवल ज्ञान का दाता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माता और राष्ट्र निर्माण का सशक्त आधार होता है।” इसी भावना को आत्मसात करते हुए श्री प्रतापसिंह बारहठ राजकीय महाविद्यालय, शाहपुरा में शुक्रवार को अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (उच्च शिक्षा) के तत्वावधान में ‘गुरु वंदन’ कार्यक्रम का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों की भूमिका, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों तथा राष्ट्र निर्माण में गुरु के योगदान पर गहन चिंतन और मंथन हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. श्याम सुंदर भट्ट, महासचिव, राजस्थान भूगोल परिषद् ने अपने प्रेरक एवं ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि मनुष्य सृष्टि का श्रेष्ठतम प्राणी है, किंतु उसकी श्रेष्ठता का वास्तविक आधार संस्कार, शिक्षा और गुरु का मार्गदर्शन है। उन्होंने महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि सही दिशा और उचित शिक्षा ही व्यक्ति को महान बनाती है।
डॉ. भट्ट ने कहा कि एक सच्चा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि विद्यार्थियों की प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारने का कार्य करता है। उन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’, दार्शनिक एवं शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा इतिहास के विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से गुरु की महिमा का प्रभावी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि समाज की दिशा और दशा बदलने की शक्ति यदि किसी के पास है तो वह एक समर्पित शिक्षक के पास है।
अपने उद्बोधन में उन्होंने भारतीय शिक्षा की प्राचीन गौरवशाली ज्ञान परंपरा को नई शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और नवाचार का स्वागत करते हुए भी भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और पारंपरिक ज्ञान को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाए रखना समय की मांग है।

डॉ. भट्ट ने इस अवसर पर शाहपुरा की गौरवशाली क्रांतिकारी परंपरा को भी स्मरण किया। उन्होंने अमर शहीद प्रताप सिंह बारहठ, केसरी सिंह बारहठ तथा जोरावर सिंह बारहठ के अद्वितीय राष्ट्रप्रेम और बलिदान को याद करते हुए कहा कि ऐसे महान सपूतों का जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (उच्च शिक्षा), भीलवाड़ा के जिला अध्यक्ष डॉ. पुष्करराज मीणा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र की प्रेरक कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा प्रणाली केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन प्रबंधन, नैतिकता, व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता का भी विकास करती रही है।
उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे शिक्षा को केवल परीक्षा और अंक प्राप्ति का माध्यम न मानें, बल्कि चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास और समाज सेवा का साधन बनाएं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी, आवश्यकता केवल उसे आधुनिक संदर्भों में समझने और अपनाने की है।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (उच्च शिक्षा) के प्रदेश सह-प्रचार प्रमुख धर्मनारायण वैष्णव सहित महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक एवं शिक्षाविद् उपस्थित रहे। इनमें प्रो. रामावतार मीणा, प्रो. मूलचंद खटीक, डॉ. ऋचा अंगिरा, प्रो. विजय परमार, डॉ. दलवीर सिंह, प्रो. मुकेश कुमार मीणा, प्रो. अजीत सिंह, प्रो. अंकित मीणा, प्रो. अतुल जैन, प्रो. बसंती मीणा, प्रो. अतुल कुमार जोशी तथा प्रो. नेहा जैन सहित महाविद्यालय परिवार और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने भी भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका पर गंभीरता से विचार सुने तथा प्रेरणा प्राप्त की। पूरे आयोजन में गुरु के प्रति सम्मान, भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था और राष्ट्र के प्रति समर्पण का वातावरण बना रहा।
कार्यक्रम के अंत में स्थानीय इकाई की सचिव सुश्री प्रियंका ढाका ने सभी अतिथियों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त करते हुए आयोजन को सफल बनाने में सभी के सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का प्रभावी एवं सधे हुए अंदाज में संचालन अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिला उपाध्यक्ष प्रो. दिग्विजय सिंह ने किया।
‘गुरु वंदन’ कार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि गुरु केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति, चरित्र और राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत आधारशिला हैं। ऐसे आयोजन शिक्षा जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण और गुरु-शिष्य संबंधों को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।




