
भीलवाड़ा। मूलचन्द पेसवानी
“अपने ज्ञान के द्वारा अपने अज्ञान को समाप्त करना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है। गंगा में स्नान कर लेने मात्र से पाप समाप्त नहीं होते और केवल सत्संग में उपस्थित हो जाने से कोई पुण्यात्मा नहीं बन जाता। जब सत्संग हृदय में उतरता है, तभी पुण्य का द्वार अपने आप खुल जाता है।” यह प्रेरणादायी उद्गार अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय, शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने गुरुवार को ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
सत्संग के दौरान धर्म, अध्यात्म और आत्मज्ञान की ऐसी गंगा बही कि पांडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर गुरु वचनों का श्रवण करते रहे। आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अज्ञान है और उसका नाश केवल ज्ञान से ही संभव है। बाहरी आडंबर, कर्मकांड या दिखावे से नहीं, बल्कि आत्मबोध और सद्गुरु की कृपा से जीवन का वास्तविक परिवर्तन होता है।
श्रीकृष्ण हैं जगद्गुरु, अर्जुन आदर्श शिष्य
आचार्यश्री ने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता को माध्यम बनाकर समस्त मानवता के अर्जुनों की आँखें खोलने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि संसार में श्रीकृष्ण जैसा कोई जगद्गुरु नहीं और अर्जुन जैसा कोई आदर्श शिष्य नहीं हुआ। गुरु और शिष्य का ऐसा संबंध ही ज्ञान को पूर्णता प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए सबसे पहले आत्मजागृति आवश्यक है। जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और आत्मतत्त्व को नहीं पहचानता, तब तक वह जीवन के मूल उद्देश्य को नहीं समझ सकता। उन्होंने कहा कि “अपने आप से अपने आपको जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।”
राम नाम ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन की प्रत्येक उपलब्धि का आधार भगवान का नाम है। उन्होंने कहा कि कामना हो या निष्काम भावना, अर्थ हो या धर्म, भक्ति हो या संसार—हर कार्य के केंद्र में यदि राम हैं, तो जीवन धन्य हो जाता है।
उन्होंने कहा कि “भगवान और भगवान का नाम यदि साथ है, तो नरक भी नरक नहीं रह जाता।” राम नाम का स्मरण मनुष्य को भय, मोह और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने की शक्ति रखता है।

दुःख भी परमात्मा का सकारात्मक संदेश है
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए कहा कि मनुष्य सुख में ईश्वर को भूल जाता है, लेकिन दुःख आते ही परमात्मा को पुकारने लगता है। उन्होंने कहा कि अनुभवी संतों के अंतःकरण का अनुभव है कि दुःख, पीड़ा, अभाव, कष्ट और जीवन की टीस भी परमात्मा के सकारात्मक हस्ताक्षर हैं। यही परिस्थितियाँ मनुष्य को ईश्वर की ओर ले जाती हैं।
उन्होंने कहा कि परमात्मा स्वयं सुख का अथाह सागर हैं और उनके नाम के सुमिरन जैसा आनंद संसार में दूसरा कोई नहीं। यदि जीवन का अंतिम क्षण भी भगवान के स्मरण में बीते, तो जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो सकता है। उन्होंने कहा, “जीना एक कला है, लेकिन मरना भी याद होना चाहिए।”
सद्गुरु ही मिटाते हैं अज्ञान का अंधकार
आचार्यश्री ने सद्गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन में उठना, बैठना, हँसना, रोना और जीवन जीने की सही कला भी सद्गुरु ही सिखाते हैं। उन्होंने कहा कि दूसरों का उपहास करना संघर्ष और वैमनस्य को जन्म देता है, जबकि भगवान और गुरु का स्मरण कर मुस्कुराने से जीवन आनंदमय बन जाता है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक सद्गुरु वही है, जो शिष्य को उसके वास्तविक स्वरूप, नाम और निर्वाण का मार्ग दिखाए तथा उसे मुक्ति का बोध कराए। ऐसा सद्गुरु संसार के सुख-दुःख और असंतोष से ऊपर उठकर शिष्य के जीवन में ज्ञान का दीप प्रज्वलित करता है।
उन्होंने कहा कि “ज्ञान वही है, जो अज्ञान को ललकारे। हमें संसार का नहीं, बल्कि संसार के रचयिता का ध्यान करना चाहिए, क्योंकि वास्तविक कल्याण वही कर सकता है।”
मानस प्रवचन और भजनों से भक्तिमय हुआ वातावरण
आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी महाराज (आलोट) ने श्रीरामचरितमानस पर आधारित भावपूर्ण प्रवचन प्रस्तुत किया। इसके बाद अनेक श्रद्धालुओं ने भजनों की मधुर प्रस्तुतियों से पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज की आरती उतारकर आशीर्वाद प्राप्त किया। भीलवाड़ा सहित आसपास के अनेक जिलों एवं विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु सत्संग में शामिल हुए।
प्रतिदिन हो रहे हैं आध्यात्मिक आयोजन
‘विश्व शांति कल्याण चातुर्मास’ के अंतर्गत प्रतिदिन प्रातः 8:30 से 9:00 बजे तक रामधुनी एवं वाणीजी का पाठ तथा सुबह 9:00 से 10:00 बजे तक दैनिक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। वहीं प्रतिदिन सूर्यास्त के समय होने वाली संध्या आरती में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रद्धाभाव के साथ भाग लेकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।




