रामस्नेही संप्रदाय के इतिहास का एक और अनसुना अध्याय…चौथी कड़ी
🔸 7 माह की समाधि का रहस्य 🔸 चावल प्रसाद की परंपरा कैसे शुरू हुई? 🔸 उदयपुर राज्य से मान्यता कैसे मिली? 🔸 शाहपुरा के राजा रणसिंह और स्वामी रामचरणजी की ऐतिहासिक भेंट

नमस्कार!
शाहपुरा संवाद के विशेष साप्ताहिक इतिहास बुलेटिन “शाहपुरा की बात, हर हफ्ते आपके साथ” में आपका हार्दिक स्वागत है।
इस रविवार 09 अगस्त 2026, सुबह 8:00 बजे, हम लेकर आ रहे हैं रामस्नेही संप्रदाय के आद्याचार्य स्वामी रामचरणजी महाराज के जीवन पर आधारित विशेष श्रृंखला की चौथी कड़ी।

इस अंक में जानिए—वृंदावन की यात्रा बीच में छोड़कर स्वामी रामचरणजी ने मेवाड़ का मार्ग क्यों अपनाया? वर्ष 1760 में भीलवाड़ा में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना कैसे हुई? सात माह तक एक ही आसन पर समाधिस्थ रहने की अद्भुत साधना और उसी से प्रारंभ हुई चावल प्रसाद की परंपरा का रहस्य क्या है?
देखिए, किन लोगों ने उनकी बढ़ती ख्याति से घबराकर विरोध किया, उदयपुर महाराणा तक शिकायत क्यों पहुँची और कैसे शिष्य देवकरणजी ने शास्त्रार्थ कर रामस्नेही संप्रदाय को राजकीय मान्यता दिलाई।
जानिए, कुहाड़ा शिला, कोठारी नदी और डाणियों की कोटड़ी से जुड़ी वे ऐतिहासिक घटनाएँ, जिन्होंने इस संप्रदाय के विस्तार को नई दिशा दी।
सबसे रोचक प्रसंग—शाहपुरा के महाराजा रणसिंहजी ने स्वामी रामचरणजी को राजमहल चलने का निमंत्रण दिया, लेकिन उन्होंने राजसी वैभव को छोड़कर राजपरिवार के श्मशान स्थल को ही अपना प्रवास क्यों बनाया? यही स्थान आगे चलकर शाहपुरा के आध्यात्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बना।
इतिहास के इन अनछुए तथ्यों और दुर्लभ प्रसंगों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे शिक्षाविद् तेजपाल उपाध्याय।
तो देखना न भूलें “शाहपुरा की बात, हर हफ्ते आपके साथ”, रविवार, 09 अगस्त 2026, सुबह 8:00 बजे, केवल Shahpurasamwad के यूट्यूब चैनल पर।
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