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‘कहीं हम अपने वोट का दांव नाकारा घोड़ों पर तो नहीं लगा रहे?’

साहित्यकार डॉ. कैलाश मंडेला का शाहपुरा की जनता के नाम खुला पत्र—कहा, दल-जाति से ऊपर उठकर चुनें शिक्षित, ईमानदार और जुझारू पार्षद

शाहपुरा। नगर पालिका चुनाव की सरगर्मी के बीच प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि एवं मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. कैलाश मंडेला ने शाहपुरा की आम जनता के नाम एक ऐसा खुला पत्र जारी किया है, जिसने चुनावी माहौल में सीधे मतदाता की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंडेला ने किसी दल या प्रत्याशी के पक्ष में अपील करने के बजाय मतदाता की अंतरात्मा को झकझोरते हुए पूछा है कि आखिर शाहपुरा को अगले पांच साल के लिए किसके हाथों सौंपा जाए।

मंडेला का यह पत्र केवल चुनावी अपील नहीं, बल्कि शहर की दशकों पुरानी बदहाली, अनियोजित विकास और राजनीतिक व्यवस्था पर एक गंभीर आत्ममंथन के रूप में सामने आया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि चुनाव में खड़ा हर व्यक्ति अपना है, चाहे वह किसी राजनीतिक दल से हो, किसी संगठन से जुड़ा हो या निर्दलीय मैदान में हो। उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या पार्टी का हित साधना नहीं, बल्कि शाहपुरा के जागरूक नागरिकों को यह सोचने के लिए मजबूर करना है कि ऐसा नगर पालिका बोर्ड कब आएगा, जो शाहपुरा की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बचाते हुए उसे विकास के चरम पर पहुंचाए।

‘आखिर ऐसा बोर्ड कब आएगा?’

डॉ. मंडेला ने शाहपुरा की जनता से सवाल किया है कि दशकों से बदहाली, बदइंतजामी और बेरुखी झेल रहे शहर को क्या अब ऐसा शाहपुरा नहीं चाहिए, जहां लोग आना भी पसंद करें, रहना भी पसंद करें और जीना भी पसंद करें।

उनकी कल्पना का शाहपुरा ऐसा है, जो रोजगार के अवसरों के साथ तेजी से आगे बढ़े, पर्यटन के नक्शे पर अपनी पहचान बनाए और देश के नक्शे पर अपने गौरवशाली अतीत तथा समृद्ध वर्तमान के साथ चमकता दिखाई दे।

उन्होंने लोकतंत्र में वोट को विकास की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि विकास की हर किरण वोट की ऊर्जा से निकलती है। लेकिन इसके लिए मतदाता को अपने वोट की कीमत समझनी होगी और दलगत, जातिगत तथा व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर निर्णय लेना होगा।

पानी से लेकर पार्किंग तक—कहां है व्यवस्था?

मंडेला ने अपने पत्र में शाहपुरा की समस्याओं की लंबी फेहरिस्त सामने रखी है। उनका सवाल है कि आखिर नगर के विकास की दिशा क्या है?

पानी की निकासी, सार्वजनिक भू-संपत्तियों और हेरिटेज का संरक्षण, सड़कों और फुटपाथों का रखरखाव, शिक्षा एवं चिकित्सा संस्थानों की स्थिति, नहर की सफाई और अतिक्रमण, यातायात व्यवस्था, बस स्टैंड, नियमित बस सेवाएं, रोजगार, रीको क्षेत्र, कृषि मंडी, खेल मैदान, सामाजिक-धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था, पार्किंग और गलियों में बढ़ते अतिक्रमण जैसे मुद्दे आखिर कब प्राथमिकता बनेंगे?

इनके साथ ही शाहपुरा को पुनः जिला बनाने और रेल लाने की मांग को भी उन्होंने शहर की सामूहिक पीड़ा से जोड़ा है।

‘अस्पतालों में विशेषज्ञ नहीं, सड़कों पर मौत के कुएं’

खुले पत्र का सबसे तीखा हिस्सा शाहपुरा की मौजूदा स्थिति पर उनकी टिप्पणी है। उन्होंने कहा कि आज लगभग हर क्षेत्र में अराजकता दिखाई दे रही है।

अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सड़कों पर गड्ढे, गंदगी से अटे तालाब और खाइयां, अतिक्रमण से बाधित बाजार, जाम में फंसी यातायात व्यवस्था, आवारा पशुओं के बीच चलती सब्जी मंडी और उजड़े हुए उद्यानों का जिक्र करते हुए मंडेला ने सवाल खड़ा किया है—

“आखिर इन सब विषमताओं का जिम्मेदार कौन है?”

लेकिन इसके लिए उन्होंने किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक बोर्ड या किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं माना। उनका कहना है कि सबसे पहले जिम्मेदारी हम नागरिकों की है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या हमने वोट का सही इस्तेमाल किया?

मंडेला ने मतदाता को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि जब भी मौका आया, हमने अपने वोट का इस्तेमाल व्यक्तिगत, दलगत या जातिगत जुड़ाव के आधार पर किया। परिणाम यह रहा कि शहर की मूल समस्याएं जस की तस बनी रहीं।

साथ ही उन्होंने राजनीतिक दलों को भी आईना दिखाया। उनका कहना है कि दलों ने हमेशा शिक्षित, सच्चे, ईमानदार और जुझारू व्यक्तियों को टिकट नहीं दिया।

पत्र में मंडेला ने एक बेहद चुभती हुई टिप्पणी की है कि पार्टियों का झंडा उठाने वाले प्रत्याशी यदि आम आदमी और शहर के हितों के लिए डंडा उठाने में भी समर्थ होते तो शायद शाहपुरा का जिला नहीं जाता।

यही बात उनके पत्र को सामान्य चुनावी अपील से अलग करती है।

‘सामान्य सीट आई तो सभी प्रत्याशियों के घुंघरू बंध गए’

नगर पालिका अध्यक्ष का पद सामान्य वर्ग के लिए होने के संदर्भ में मंडेला ने कहा कि इससे सभी वर्गों के संभावित दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है। ऐसे में असली सवाल यह है कि शाहपुरा की जनता अपना पार्षद कैसा चाहती है और अपना चेयरमैन कैसा चाहती है।

उन्होंने मतदाताओं को याद दिलाया कि पार्षद के अधिकार भले ही सीमित हों, लेकिन यदि पार्षद शिक्षित नहीं है, अपनी बात रखने में सक्षम नहीं है, जुझारू नहीं है और सबसे बढ़कर मन, वचन और कर्म से ईमानदार नहीं है तो अगले पांच साल बाद भी शहर के सामने वही समस्याएं खड़ी मिलेंगी।

यहीं मंडेला ने मतदाताओं के सामने सबसे तीखा सवाल रखा—

“कहीं हम अपने बहुमूल्य वोट का दांव उन नाकारा घोड़ों पर तो नहीं लगा रहे, जिनके खुरों में भ्रष्टाचार का खुरपका रोग लगा है?”

यह सवाल अब चुनावी बहस के बीच सीधे मतदाताओं की चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

‘आपका पार्षद ही कल का प्रथम नागरिक हो सकता है’

मंडेला ने जनता से अपील की है कि वोट देते समय यह सोचकर मतदान करें कि आज जिस व्यक्ति को पार्षद बना रहे हैं, संभव है कल वही शाहपुरा का प्रथम नागरिक यानी चेयरमैन बने।

इसलिए प्रत्याशी चुनते समय केवल पार्टी, जाति या व्यक्तिगत संबंध नहीं, बल्कि उसके चरित्र, शिक्षा, सोच, ईमानदारी और संघर्ष करने की क्षमता को आधार बनाया जाए।

उनका कहना है कि ऐसा व्यक्ति चुना जाए जिसके बाद उसके कुकृत्यों पर पूरे शाहपुरा को शर्मिंदा न होना पड़े।

प्रत्याशियों से पांच सवाल जरूर पूछिए

खुले पत्र में मंडेला ने शाहपुरा के मतदाताओं को एक तरह का ‘चुनावी प्रश्नपत्र’ भी दिया है। उन्होंने कहा कि जब आपके वार्ड का प्रत्याशी वोट मांगने आपके पास आए तो उससे सीधे सवाल कीजिए—

आप चुनाव में क्यों खड़े हो रहे हैं?

आपका अपने वार्ड के लिए सपना क्या है?

सरकारी धन से होने वाले प्रत्येक कार्य के प्रति आपकी सोच क्या है?

यदि बोर्ड कोई गलत फैसला लेता है तो क्या आप पार्टी लाइन से हटकर उसका विरोध कर सकेंगे?

शाहपुरा को पुनः जिला बनाने के आंदोलन में आपकी प्रतिबद्धता पार्टी मत के साथ होगी या जनमत के साथ?

इन सवालों के जवाब ही मतदाता को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि प्रत्याशी के पास केवल चुनाव लड़ने की इच्छा है या वास्तव में शहर के लिए कोई विजन भी है।

‘सभी प्रत्याशियों की डिबेट कराएं, पता चल जाएगा किस तिल में कितना तेल’

मंडेला ने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा है कि यदि संभव हो तो सभी दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों के बीच सार्वजनिक डिबेट कराई जाए।

उनका मानना है कि आमने-सामने सवाल-जवाब होंगे तो मतदाताओं के सामने यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रत्याशी की सोच कितनी गहरी है, कौन अपने वार्ड के लिए तैयार है और किसके पास केवल चुनावी नारे हैं।

उनकी यह बात शाहपुरा के चुनावी माहौल में एक नई बहस को जन्म दे सकती है—क्या प्रत्याशी केवल वोट मांगें या मतदाताओं के सवालों का जवाब भी दें?

‘नेता कुछ साल के लिए चुने जाते हैं, साहित्यकार जीवनभर जनमत की आवाज उठाता है’

मंडेला ने अपने पत्र में अपने सार्वजनिक जीवन और लेखकीय भूमिका को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि नेता को जनता जनमत की आवाज उठाने के लिए चुनती है, जबकि कवि और लेखक अपनी रचनाओं तथा संभाषणों के माध्यम से जनभावनाओं को सामने रखते हैं।

उन्होंने कहा कि नेता कुछ वर्षों के लिए चुने जाते हैं और उनकी दलगत प्रतिबद्धताएं उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती हैं, लेकिन संत, कवि, पत्रकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता जीवनभर आम आदमी के मन की बात बिना पूर्वाग्रह और राजनीतिक पक्षपात के कहते और लिखते रहते हैं।

अपने करीब चार दशक के सक्रिय सार्वजनिक जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश रही है कि उनकी लेखनी विश्व, देश और समाज में समरसता स्थापित करे तथा सच को सच लिखने का साहस बना रहे।

उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही—

“व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति पर चोट होना जरूरी है।”

यानी निशाना किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस सोच और व्यवस्था पर होना चाहिए जो शहर के सामूहिक हित को पीछे छोड़ देती है।

‘शुरुआत घर से हो, फिर वार्ड और शहर से’

मंडेला ने बदलाव की शुरुआत अपने घर से करने की बात कही है। उनका संदेश है कि पहले घर, फिर मोहल्ला, वार्ड, नगर, तहसील, जिला, राज्य और देश—हर स्तर पर समाजहित को प्राथमिकता दी जाए।

शाहपुरा के लिए उनकी प्राथमिकताएं भी स्पष्ट हैं—

रोजगारोन्मुखी विकास, पर्यटन का विस्तार, शिक्षा और चिकित्सा का हब, स्वच्छता, व्यवस्थित यातायात और सामाजिक सौहार्द।

उनका सपना ऐसा शाहपुरा है जिसकी पहचान केवल उसके गौरवशाली इतिहास से नहीं, बल्कि उसके बेहतर वर्तमान और मजबूत भविष्य से भी हो।

अब गेंद मतदाता के पाले में

डॉ. कैलाश मंडेला का यह खुला पत्र मूल रूप से किसी प्रत्याशी को जिताने या किसी दल को हराने की अपील नहीं करता, बल्कि मतदाता को अपने वोट की ताकत पहचानने का संदेश देता है।

नगर पालिका चुनाव में अब प्रत्याशियों के नाम और राजनीतिक समीकरण सामने आने लगे हैं। ऐसे समय में यह पत्र एक बड़ा सवाल छोड़ता है—

क्या शाहपुरा इस बार केवल पार्षद चुनेगा या अगले पांच वर्षों की विकास दिशा भी तय करेगा?

क्या मतदाता जाति, दल और व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर अपने वार्ड के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति को चुनेंगे?

क्या प्रत्याशी जनता के सवालों के जवाब देने के लिए तैयार होंगे?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या इस बार शाहपुरा का वोट सिर्फ एक व्यक्ति को चुनेगा या एक बेहतर शाहपुरा की नींव रखेगा?

डॉ. मंडेला ने अपने पत्र का समापन भी इसी उम्मीद के साथ किया है कि शाहपुरा को अच्छे पार्षदों की सौगात मिले और लोग बिना दबाव, निष्पक्ष होकर मतदान करें।

उनका चुनावी संदेश है—

स्वच्छ शाहपुरा

स्वस्थ शाहपुरा

समर्थ शाहपुरा

खुले पत्र के जरिए साहित्यकार डॉ. कैलाश मंडेला ने चुनावी राजनीति के बीच असल बहस को प्रत्याशी से हटाकर मतदाता की जिम्मेदारी पर ला खड़ा किया है। अब देखना यह है कि 11 सितम्बर को शाहपुरा की जनता इस सवाल का जवाब अपने वोट से कैसे देती है।

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