‘शाहपुरा संवाद’ से विशेष बातचीत में रामस्नेही संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने दिए आध्यात्म, राष्ट्रभक्ति और संस्कारों के प्रेरक सूत्र

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
“इस नश्वर संसार में यदि कोई जीव को भवसागर से पार लगा सकता है तो वह केवल सद्गुरु हैं।” रामस्नेही संप्रदाय के पीठाधीश्वर एवं जगद्गुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने ‘शाहपुरा संवाद’ से विशेष बातचीत में जब यह वाक्य कहा, तो उनके शब्दों में केवल आध्यात्मिक संदेश ही नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए एक गहरी जीवन-दृष्टि भी समाहित थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में भौतिक सुखों के पीछे भागता मनुष्य यदि आत्मिक शांति, पारिवारिक सुख और सामाजिक सम्मान चाहता है, तो उसे सद्गुरु की शरण, राम-नाम का स्मरण और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को जीवन का आधार बनाना होगा।
आचार्य श्री ने कहा कि सद्गुरु केवल उपदेशक नहीं, बल्कि जीवन के पथ-प्रदर्शक होते हैं। उनका सान्निध्य मनुष्य के भीतर छिपी चेतना को जागृत करता है। सद्गुरु व्यक्ति को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य, सेवा, संयम और सदाचार के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। जिस जीवन में गुरु का मार्गदर्शन और भगवान का स्मरण है, वहां भय, भ्रम और भटकाव के लिए कोई स्थान नहीं रहता।
उन्होंने समाज में तेजी से बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मांस, मदिरा और अन्य सभी प्रकार के व्यसन व्यक्ति ही नहीं, पूरे परिवार के विनाश का कारण बनते हैं। व्यसन घरों की खुशियां छीन लेते हैं, व्यापार की उन्नति रोक देते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी नष्ट कर देते हैं। उन्होंने युवाओं से विशेष आग्रह किया कि वे क्षणिक सुख देने वाली बुरी आदतों से दूर रहकर संयम, चरित्र और राष्ट्रसेवा का मार्ग अपनाएं।

आचार्य श्री ने कहा कि रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक सत्गुरु श्री रामचरणजी महाराज ने संपूर्ण मानवता को सद्मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उनका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक उन्नति नहीं, बल्कि समाज में संस्कार, विश्वास, प्रेम और सद्भाव का वातावरण तैयार करना था। जब व्यक्ति धर्म, सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलता है, तब परिवार में संस्कार, व्यापार में विश्वास और समाज में समरसता स्वतः स्थापित हो जाती है।
राष्ट्र और धर्म के संबंध को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “राम हैं तो राष्ट्र है और राष्ट्र है तो राम हैं।” उन्होंने कहा कि भगवान राम केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, मर्यादा, कर्तव्य और राष्ट्रचेतना के शाश्वत प्रतीक हैं। जिस समाज में धर्म का सम्मान होता है, वहां न्याय, नैतिकता और विकास साथ-साथ चलते हैं। धर्म समाज को जोड़ता है, विभाजित नहीं करता।
उन्होंने कहा कि जब किसी नगर में संत का आगमन होता है, तब वह नगर तीर्थधाम बन जाता है। संतों के चरण जहां पड़ते हैं, वहां आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। उनकी वाणी लोगों के भीतर सोई हुई चेतना को जगाती है और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा सेवा की भावना को मजबूत करती है। संत समाज के लिए दीपस्तंभ हैं, जो अंधकार में भी सही दिशा दिखाते हैं।
मानवता को सबसे बड़ा धर्म बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दया, करुणा, सेवा और परोपकार की भावना होना आवश्यक है। यदि हर व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख को अपना समझकर कार्य करेगा, तो समाज में वैमनस्य और कटुता के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। उन्होंने कहा कि मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है।
युवाओं को राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य युवाओं के चरित्र और संस्कारों पर निर्भर करता है। यदि युवा अपने जीवन में अनुशासन, राष्ट्रभक्ति, सेवा और आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाएं, तो भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में और अधिक तेज़ी से आगे बढ़ेगा। उन्होंने युवाओं से सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए सकारात्मक भूमिका निभाने का आह्वान किया।
गुरु-शिष्य संबंध की अनुपम व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा, “गुरु पुष्प के समान होते हैं और शिष्य को भंवरे या मधुमक्खी की तरह होना चाहिए।” जिस प्रकार भंवरा पुष्प की सुगंध ग्रहण करता है और मधुमक्खी मधु संचित करती है, उसी प्रकार शिष्य को गुरु के ज्ञान, आचरण और संस्कारों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। तभी उसका जीवन सुगंधित और मधुर बन सकता है।
भारत की संत परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह देश ऋषियों, मुनियों और संतों की तपोभूमि रहा है। यहां संतों की निरंतर परंपरा इस बात का प्रमाण है कि इस भूमि के कण-कण में आध्यात्मिक चेतना विद्यमान है। उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि जीवन में सुख, शांति और संतोष चाहता है तो उसे केवल एक मंत्र अपनाना चाहिए— “जाति राम राखे, ताहि विधि रहिए।” अर्थात प्रभु जिस परिस्थिति में रखें, उसमें संतोष, श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवन व्यतीत करें।
आचार्य श्री ने अंत में अत्यंत मार्मिक संदेश देते हुए कहा कि जीवन में अहंकार को कभी स्थान नहीं देना चाहिए। यदि कुछ चढ़ाना ही है तो भगवान को जल, दूध, पुष्प, तेल और प्रसाद चढ़ाइए, अहंकार नहीं। उन्होंने कहा कि संस्कारों की शुरुआत घर से होती है। जिन घरों में राम-नाम का स्मरण, भजन और सत्संग होता है, वहां संस्कारों की सुगंध पीढ़ियों तक फैलती है; लेकिन जहां केवल टीवी धारावाहिकों की कलह और नकारात्मकता का वातावरण रहता है, वहां रिश्तों की मिठास धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
अपने संदेश के समापन पर जगद्गुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने समाज से व्यसनमुक्त, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ जीवन अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि जब हर घर में राम-नाम का प्रकाश होगा, हर युवा के मन में राष्ट्रप्रेम होगा और हर परिवार में संस्कारों का दीप जलेगा, तभी भारत आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक वैभव के साथ विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम बनेगा।




