“मैंने अपने आप में गंगा का प्रवाह देखा है…”—बारहठ बलिदानियों को श्रद्धांजलि, तिरंगा रैली में गूंजे देशभक्ति के जयघोष

शाहपुरा। “मैंने अपने आप में गंगा का प्रवाह देखा है, जो बहा तो बहता ही गया।” देशभक्ति, त्याग और क्रांतिकारी चेतना से ओतप्रोत यह भाव ठाकुर केसरी सिंह बारहठ के व्यक्तित्व की उस धारा को दर्शाता है, जिसने राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ठाकुर केसरी सिंह बारहठ की पुण्यतिथि पर शुक्रवार को त्रिमूर्ति बारहठ स्मारक पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपस्थित लोगों ने पुष्पांजलि अर्पित कर बारहठ परिवार के अतुलनीय त्याग और राष्ट्रहित में किए गए बलिदान को याद किया।
उल्लेखनीय है कि ठाकुर केसरी सिंह बारहठ का निधन 14 अगस्त 1941 को हुआ था। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 2026 में उनकी 85वीं पुण्यतिथि है।

देशभक्ति नारों से गूंजा शाहपुरा
कार्यक्रम के दौरान समाधान कोचिंग क्लासेज के विद्यार्थियों ने तिरंगा रैली निकाली। हाथों में तिरंगा और जुबां पर देशभक्ति के नारे लिए बच्चों ने बारहठ क्रांति वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। रैली ने युवाओं में राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान का संदेश दिया।
इस अवसर पर प्रकाश चंद्र राव ने बारहठ वीरों की बलिदानी गाथा का स्मरण करते हुए कहा कि बारहठ परिवार को देश के लिए समर्पित एक ऐसा परिवार कहा जा सकता है, जिसने भाई, पुत्र और दामाद तक को राष्ट्र की बलिवेदी पर न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में इस प्रकार का पारिवारिक त्याग अत्यंत विरल उदाहरण है।
तलवार से तेज थी केसरी सिंह की कलम
समाधान कोचिंग क्लासेज के शिक्षक प्रहलाद चौधरी ने ठाकुर केसरी सिंह बारहठ के साहित्यिक और शैक्षिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे केवल क्रांतिकारी और देशभक्त ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि और विद्वान भी थे। उनकी कलम की धार तलवार से भी तेज थी।
उन्होंने कहा कि ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ उनकी प्रसिद्ध रचना रही, जिसने तत्कालीन राजाओं और जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य किया। केसरी सिंह बारहठ अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे और साहित्य के माध्यम से भी राष्ट्रभक्ति की अलख जगाते रहे। ‘चेतावणी रा चुंगट्या’ के माध्यम से उन्होंने महाराणा फतेह सिंह को 1903 के दिल्ली दरबार में जाने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
युवाओं के लिए राष्ट्र पहले—सिर्फ रोजगार नहीं
संस्थान के सचिव कैलाश सिंह जाड़ावत ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि युवाओं के जीवन में राष्ट्र और समाज के प्रति चिंतन सर्वोच्च स्थान पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल शिक्षा और रोजगार ही युवा जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता, बल्कि देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने बारहठ परिवार के युवा क्रांतिकारी कुंवर प्रताप सिंह बारहठ का उदाहरण देते हुए कहा कि कम उम्र में ही उन्होंने क्रांति का रास्ता चुना और देश के लिए यातनाएं सहते हुए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। प्रताप सिंह बारहठ ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1918 में शहादत दी।
पर्यावरण और संस्कारों में दिखता है राष्ट्र
भारत विकास परिषद के अध्यक्ष पवन बांगड़ ने स्वामी विवेकानंद के आदर्शों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र का निर्माण केवल नारों से नहीं, बल्कि संस्कारित और जिम्मेदार युवा शक्ति से होता है। पर्यावरण संरक्षण, संस्कार और राष्ट्रसेवा की भावना से ही मजबूत भारत का निर्माण संभव है।
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण प्रभारी थानमल जीनगर, रामप्रसाद सेन, दिनेश नायक सहित समाधान कोचिंग क्लासेज के विद्यार्थियों ने त्रिमूर्ति बारहठ स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर क्रांति वीरों को नमन किया।
कार्यक्रम के अंत में सभी विद्यार्थियों को फल वितरित किए गए। श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने एक बार फिर शाहपुरा की उस गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत को सामने रखा, जिसमें राष्ट्र के लिए परिवार तक को समर्पित कर देने का अद्भुत साहस और त्याग दिखाई देता है।




