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मंडी है, किसान परेशान, उपज लेकर दूसरे शहरों की दौड़

शाहपुरा कृषि मंडी की बदहाली पर उठे सवाल

शाहपुरा।
जिस कृषि उपज मंडी की चौखट पर क्षेत्र के किसानों को अपनी मेहनत की कमाई का उचित मूल्य, पारदर्शी व्यवस्था और सुविधाओं की उम्मीद होनी चाहिए, वही मंडी आज अव्यवस्थाओं और उपेक्षा के सवालों के बीच खड़ी नजर आ रही है। लंबे समय से कृषि उपज मंडी का सुचारू संचालन नहीं होने के कारण शाहपुरा क्षेत्र के काश्तकारों को अपनी उपज बेचने के लिए भीलवाड़ा या कैकड़ी का रुख करना पड़ रहा है। किसान के लिए खेत से मंडी तक पहुंचना ही जहां चुनौती है, वहीं अपनी ही मंडी में व्यवस्था नहीं मिलने के कारण उसे अतिरिक्त दूरी, परिवहन खर्च और समय की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।
मंडी का मकसद साफ है किसान अपनी उपज लेकर आए, उसे बेहतर बाजार मिले, व्यापारियों के बीच प्रतिस्पर्धा हो और सरकारी प्रावधानों के अनुसार उसे उपज का उचित मूल्य मिले। लेकिन शाहपुरा कृषि उपज मंडी के मौजूदा हालात इन उद्देश्यों पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं।

अपनी मंडी होते हुए भी दूसरे शहरों की दौड़-
शाहपुरा और आसपास के गांवों के किसान वर्षों से इस मंडी से बेहतर व्यवस्था की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन मंडी का नियमित और प्रभावी संचालन नहीं होने से किसान अपनी उपज लेकर भीलवाड़ा या कैकड़ी जाने को मजबूर हैं। इससे किसान को परिवहन का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है और उपज को दूर तक ले जाने की परेशानी अलग।
किसानों का कहना है कि जब शाहपुरा में कृषि उपज मंडी स्थापित है तो उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए दूसरे शहरों की ओर क्यों जाना पड़े? स्थानीय स्तर पर मंडी को सक्रिय और सुविधायुक्त बनाना आखिर किसकी जिम्मेदारी है?
मूलभूत सुविधाएं तक नसीब नहीं-
मंडी में आने वाले काश्तकारों के लिए मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता भी बड़ा सवाल बनी हुई है। किसान जब अपनी उपज लेकर मंडी पहुंचता है तो उसे अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिलतीं। ऐसे में मंडी केवल व्यापार का स्थान नहीं रह जाती, बल्कि किसान के लिए इंतजार, असुविधा और अनिश्चितता का केंद्र बनती दिखाई देती है।
किसानों का कहना है कि मंडी में पेयजल, बैठने, साफ-सफाई, उपज की तौल, जानकारी और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं प्रभावी ढंग से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि किसान अपनी उपज लेकर सम्मानजनक तरीके से व्यापार कर सके।
स्थायी मंडी सचिव नहीं, योजनाओं की रफ्तार भी सुस्त-
मंडी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सबसे गंभीर सवालों में से एक स्थायी मंडी सचिव की नियुक्ति को लेकर है। लंबे समय से स्थायी सचिव नहीं होने के कारण मंडी से जुड़ी व्यवस्थाओं और राज्य सरकार की योजनाओं की क्रियान्विति प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। कृषि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े किसान तक पहुंचाना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन जब मंडी का प्रशासनिक ढांचा ही स्थायी और प्रभावी नहीं होगा तो योजनाओं की निगरानी, व्यापारियों की समस्याओं का समाधान और किसानों की शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण कैसे होगाकृयह सवाल लगातार उठ रहा है।
व्यापारी भी परेशान, मांगें फाइलों में कैद!-
मंडी की अव्यवस्था का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं है। व्यापारियों की भी लंबे समय से कई मांगें लंबित बताई जा रही हैं। व्यापारियों का कहना है कि उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में अपेक्षित गंभीरता और प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
मंडी में किसान, व्यापारी और प्रशासन इन तीनों के बीच बेहतर तालमेल होना किसी भी कृषि मंडी की सफलता की पहली शर्त है। लेकिन शाहपुरा में यही समन्वय कमजोर नजर आ रहा है। नतीजा यह कि किसान अपनी उपज लेकर मंडी आता है तो उसे कई सवालों के जवाब नहीं मिलते और व्यापारी भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इंतजार करता रहता है।
किसान पूछता है सरकारी भाव का लाभ आखिर किसे?-
सबसे गंभीर चिंता उपज के उचित मूल्य को लेकर है। किसानों की शिकायत है कि मंडी प्रशासन और काश्तकारों के बीच पर्याप्त संवाद नहीं होने से किसान कई बार अपनी उपज के संबंध में सही जानकारी से वंचित रह जाता है। आरोप यह भी है कि कतिपय व्यापारी किसानों को गुमराह कर सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य या उपलब्ध बाजार व्यवस्था का पूरा लाभ किसान तक नहीं पहुंचने देते।
यदि ऐसा है तो सवाल केवल मंडी व्यवस्था का नहीं, बल्कि किसान की मेहनत और उसके अधिकार का है। किसान पूरे मौसम खेत में पसीना बहाता है, मौसम की मार झेलता है, महंगे बीज-खाद और कृषि लागत उठाता है और जब फसल बेचने की बारी आती है तो उसे सही जानकारी और उचित मूल्य के लिए ही संघर्ष करना पड़ेकृतो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ग्रीन बेल्ट का लोकार्पण और सूचना व्यवस्था पर बड़ा सवाल-
मंडी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर हाल ही में एक और सवाल खड़ा हुआ। हरियालो राजस्थान अभियान के तहत दो दिन पूर्व मंडी परिसर में ग्रीन बेल्ट का लोकार्पण किया गया। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह निश्चित रूप से सकारात्मक पहल है, लेकिन सवाल कार्यक्रम की सूचना को लेकर है।
बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम की जानकारी न तो काश्तकारों को दी गई, न सभी व्यापारियों को और यहां तक कि मीडिया को भी इसकी सूचना नहीं दी गई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मंडी परिसर में किसान और व्यापारी रोजाना अपनी गतिविधियों के लिए आते हैं, तो ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम की सूचना उनसे क्यों छिपी रही?
मंडी प्रशासन आखिर सूचनाओं को सार्वजनिक क्यों नहीं करता?-
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंडी प्रशासन आखिर अपनी गतिविधियों और कार्यक्रमों की सूचनाओं को सार्वजनिक क्यों नहीं होने देता? सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का अपना महत्व है। कार्यक्रम की जानकारी किसानों, व्यापारियों और मीडिया तक पहुंचने से न केवल जनता की भागीदारी बढ़ती है, बल्कि प्रशासन की कार्यशैली भी सार्वजनिक निगरानी के दायरे में रहती है।
मीडिया जनता और प्रशासन के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि मंडी में होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी मीडिया तक ही नहीं पहुंचेगी तो आम किसान तक सूचना कैसे पहुंचेगी? क्या मंडी प्रशासन को चाहिए कि वह अपने कार्यक्रमों, योजनाओं, बैठकों और किसानों से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं को सार्वजनिक करे और मीडिया के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए।
अब सवालों के जवाब का इंतजार–
शाहपुरा कृषि उपज मंडी की तस्वीर बदलने के लिए केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस पहल की जरूरत है। स्थायी मंडी सचिव की व्यवस्था, मूलभूत सुविधाओं का विस्तार, किसानों और व्यापारियों की लंबित मांगों का निस्तारण, सरकारी योजनाओं की प्रभावी क्रियान्विति तथा पारदर्शी सूचना व्यवस्थाकृये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। किसान की उपज को दूसरे शहर की राह दिखाने के बजाय शाहपुरा मंडी को ही किसानों की पहली पसंद बनाना होगा। मंडी केवल भवन और परिसर का नाम नहीं, बल्कि किसान की मेहनत को बाजार तक सम्मानपूर्वक पहुंचाने की व्यवस्था है।
अब शाहपुरा के काश्तकारों की निगाहें मंडी प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों पर टिकी हैं। सवाल सीधा है जब मंडी अपने शहर में है, तो किसान को अपनी फसल लेकर बाहर क्यों जाना पड़े? और जब सरकारी व्यवस्था किसानों के लिए है, तो किसान को उसकी जानकारी पाने के लिए भटकना क्यों पड़े?

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