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शाहपुरा में साहित्यिक सुरों से सजी गोष्ठी, रचनाओं ने बांधा समां

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की मासिक गोष्ठी में गीत, भक्ति, व्यंग्य और राजस्थानी रचनाओं की रही रंगत

शाहपुरा | शाहपुरा संवाद

शब्द जब संवेदनाओं का रूप लेते हैं तो साहित्य जन्म लेता है और जब साहित्यकार अपनी रचनाओं को श्रोताओं के बीच प्रस्तुत करते हैं तो वातावरण विचार, भाव और अनुभूतियों से सराबोर हो उठता है। शाहपुरा के मधुकर भवन संघ कार्यालय में अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाहपुरा की मासिक साहित्यिक गोष्ठी भी कुछ ऐसे ही साहित्यिक रंगों से सजी। गीत, भक्ति, विरह, व्यंग्य और राजस्थानी संस्कृति से ओतप्रोत रचनाओं ने देर तक श्रोताओं को बांधे रखा।

गोष्ठी की अध्यक्षता तेजपाल उपाध्याय ने की, जबकि जयदेव जोशी मुख्य अतिथि और बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ विशिष्ट अतिथि रहे। साहित्यकारों ने अपनी विविध रचनाओं के माध्यम से साहित्य की अलग-अलग विधाओं और भावभूमियों को प्रस्तुत किया।

सरस्वती वंदना से हुआ साहित्यिक सफर का आगाज

गोष्ठी का शुभारंभ गीतकार बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ ने सरस्वती वंदना से किया। उन्होंने ‘वीणा पाणी जग कल्याणी मात शारदे विद्या दानी’ की प्रस्तुति देकर वातावरण को ज्ञान और साहित्य की आराधना से जोड़ दिया।

इसके बाद ‘बीरा’ ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं का मन मोह लिया। उन्होंने ‘कान्हा कान्हा कान्हा आ जाना, आ जाना आकर हमको अपने चरणों में बिठाना’ जैसी भक्ति रचना प्रस्तुत की। इसके बाद ‘नाकामियों का यह कहीं असर तो नहीं, या मुझ में रही कोई कसर तो नहीं’ रचना के माध्यम से आत्ममंथन और जीवन के संघर्षों को शब्द दिए।

जयदेव जोशी की रचनाओं में दिखे जीवन के विविध रंग

मुख्य अतिथि जयदेव जोशी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समय, जीवन और प्रकृति के भावों को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने ‘आधी उम्र ढली रजनी की, धरती सोती अंबर सोता’ रचना प्रस्तुत कर जीवन की संध्या और समय के गुजरने का अहसास कराया।

उन्होंने ‘विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन, उस दिन धरती पर भूचाल आ गया’ तथा ‘इस पतझड़ की शुष्क घिनौनी जलवायु में खिल पाएगा चिर यौवन का चमन कहाँ तक’ जैसी रचनाएं सुनाकर गोष्ठी को गंभीर भावभूमि प्रदान की।

चुनावी माहौल पर पैरोडी ने खूब गुदगुदाया

गोष्ठी में साहित्य के गंभीर भावों के साथ समसामयिक घटनाओं पर व्यंग्य का रंग भी देखने को मिला। सी.ए. अशोक बोहरा ने वर्तमान चुनावी माहौल पर आधारित पैरोडी ‘धन बरसे बिक गए नेता सारे’ प्रस्तुत की।

पैरोडी के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक माहौल पर व्यंग्यात्मक अंदाज में अपनी बात रखी। रचना ने श्रोताओं को गुदगुदाने के साथ समसामयिक परिस्थितियों पर सोचने का अवसर भी दिया।

हिंदी को समर्पित रही रचना

डॉ. कमलेश पाराशर ने हिंदी भाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए ‘हिंदी हमारी शान, हिंदी ही पहचान है’ रचना प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति में मातृभाषा के प्रति सम्मान और गौरव की भावना दिखाई दी।

राजस्थानी रचना ने जगाई माटी की महक

साहित्यिक गोष्ठी में राजस्थानी भाषा और संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। ओम माली ‘अंगारा’ ने ‘पग पग पर है इण मरुधर धर, पर मरण वाळा सूंरा रा पावन थान’ राजस्थानी रचना प्रस्तुत की।

राजस्थानी शब्दों की मिठास और माटी से जुड़ी भावनाओं ने गोष्ठी में स्थानीय संस्कृति का रंग भर दिया। रचना के माध्यम से राजस्थान की धरती, उसके वीरों और गौरवपूर्ण परंपराओं का स्मरण हुआ।

भक्ति और विरह के रंग में रंगी गोष्ठी

अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय ने अपनी प्रस्तुतियों से गोष्ठी को भक्ति और संवेदना के रंग में रंग दिया। उन्होंने ‘कन्हैया तुम ही बनो अब सहारा, मन कुटिल तन कामी लंपट फिरे मारा-मारा’ भक्ति पद सुनाकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

इसके बाद उन्होंने ‘आओ विरह का गीत सुनाए’ रचना प्रस्तुत की। भक्ति के साथ विरह की संवेदना ने साहित्यिक वातावरण को और गहराई प्रदान की।

आशुतोष सिंह सोदा ने पहुंचाया शिखर पर

गोष्ठी के अंतिम चरण में आशुतोष सिंह सोदा ने ‘आ लिखे प्रीत को प्रीत की रीत में, हारकर आ लिखे हार को जीत में’ रचना प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की और साहित्यिक गोष्ठी का सुंदर समापन हुआ।

पूरी गोष्ठी में साहित्य की विविध विधाओं और भावों का संगम दिखाई दिया। कहीं भक्ति की धारा बही तो कहीं प्रेम और विरह की अनुभूति सामने आई। व्यंग्य ने समसामयिक परिस्थितियों पर मुस्कुराने का अवसर दिया तो राजस्थानी रचना ने अपनी माटी और संस्कृति से जोड़ा।

साहित्यिक परंपरा को जीवंत रखने का प्रयास

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ऐसी मासिक गोष्ठियां साहित्यकारों को अपनी रचनाएं प्रस्तुत करने के साथ-साथ एक-दूसरे से संवाद और साहित्यिक विचार-विमर्श का अवसर भी प्रदान करती हैं। शाहपुरा जैसे साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश वाले क्षेत्र में नियमित साहित्यिक आयोजनों से नई पीढ़ी को भी कविता, गीत, गजल, व्यंग्य और मातृभाषाओं के साहित्य से जोड़ने का अवसर मिलता है।

मधुकर भवन में आयोजित यह गोष्ठी भी इसी साहित्यिक परंपरा की एक सुंदर कड़ी बनी, जहां शब्दों ने संवेदनाओं को आवाज दी और रचनाओं ने शाम को साहित्य के रंग में रंग दिया।

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