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जहां संस्कृत के श्लोक गूंजे, वहीं संस्कारों की नींव मजबूत हुई!

संस्कृत दिवस पर संतों ने बांटी पाठ्य पुस्तकें, विद्यार्थियों ने संस्कृत में प्रस्तुतियों से दिखाई संस्कृति की झलक

पुस्तकों के साथ विद्यार्थियों को मिली संस्कृति की सीख, संस्कृत दिवस समारोह में संतों ने कहा—संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारतीय जीवन पद्धति की आत्मा है

शाहपुरा संवाद | शाहपुरा।

शाहपुरा में गुरुवार को संस्कृत की स्वर लहरियों और भारतीय संस्कृति के संस्कारों से ऐसा माहौल बना कि विद्यालय परिसर कुछ देर के लिए कक्षा नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला नजर आया। कहीं संस्कृत में स्वागत-वंदन के स्वर गूंजे तो कहीं सरस्वती वंदना ने वातावरण को भक्तिमय कर दिया। विद्यार्थियों ने रामचरण वंदना, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और कन्या भ्रूण हत्या जैसे सामाजिक विषय पर नाटक के माध्यम से संस्कृत भाषा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जीवन और समाज से जोड़ने का संदेश दिया।

अवसर था रामस्नेही संस्कृत वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत स्कूल, शाहपुरा में आयोजित पुस्तक वितरण एवं संस्कृत दिवस समारोह का। समारोह का आयोजन श्री सेवा कार्य उम्मेद समिति, रामद्वारा गंगापुर के अध्यक्ष एवं रामस्नेही संप्रदाय के वरिष्ठ संत संत गुरूमुखराम महाराज की प्रेरणा से किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के सभी विद्यार्थियों को पाठ्य पुस्तकों का वितरण किया गया। पुस्तकें हाथ में आते ही विद्यार्थियों के चेहरों पर पढ़ाई के नए उत्साह की चमक दिखाई दी।

समारोह में रामनिवास धाम के कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज का सानिध्य रहा। पूर्व शिक्षा उपनिदेशक तेजपाल उपाध्याय ने अध्यक्षता की, जबकि शाहपुरा के एसीबीईओ डॉ. सत्यनारायण कुमावत मुख्य अतिथि रहे।

संस्कृत के श्लोकों से शुरू हुआ समारोह

कार्यक्रम की शुरुआत विद्यार्थियों के संस्कृत भाषा में स्वागत-वंदन से हुई। इसके बाद सरस्वती वंदना और रामचरण वंदना की प्रस्तुति ने वातावरण को आध्यात्मिक रंग दे दिया। छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की विविधता और संस्कारों की महत्ता को सामने रखा। कन्या भ्रूण हत्या पर प्रस्तुत नाटक ने उपस्थित लोगों को सोचने पर मजबूर किया।

कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य परमेश्वर सुथार एवं जयशंकर पाराशर ने अतिथियों का तिलक लगाकर, दुपट्टा पहनाकर एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत किया।

संत बोले—संस्कृत को फिर जन-जन की भाषा बनाना होगा

समारोह को संबोधित करते हुए संत नवनिधराम महाराज ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान परंपरा की मजबूत आधारशिला है। वेद, उपनिषद और अनेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में रचे गए हैं। उन्होंने कहा कि समय की आवश्यकता है कि संस्कृत को फिर से जन-जन की भाषा बनाने के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं।

उन्होंने शाहपुरा के रामस्नेही संस्कृत विद्यालय द्वारा संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विद्यालय भारतीय संस्कृति और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

एसीबीईओ ने संस्कृत में दिया संदेश—यह मनुष्यता की भाषा है

मुख्य अतिथि डॉ. सत्यनारायण कुमावत ने अपने संबोधन में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि संस्कृत संस्कार और मनुष्यता की भाषा है। उन्होंने कहा कि आज अंग्रेजी वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली भाषा है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत की उपयोगिता कम नहीं हुई है। तकनीकी और कंप्यूटर के क्षेत्र में भी संस्कृत की संरचना और वैज्ञानिकता को लेकर अध्ययन हो रहा है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत का अध्ययन केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि विचारों को अनुशासित करने और जीवन में संस्कार विकसित करने का माध्यम बन सकता है। नियमित रूप से संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करने से स्मरण शक्ति, एकाग्रता और मानसिक विकास में लाभ होने की बात भी उन्होंने कही।

शिक्षाविद बोले—संस्कृति बचानी है तो संस्कृत से जुड़ना होगा

अध्यक्षीय उद्बोधन में पूर्व शिक्षा उपनिदेशक तेजपाल उपाध्याय ने संस्कृत को प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की जननी बताते हुए कहा कि सनातन काल से संस्कृत ने भारतीय समाज में संस्कृति और संस्कारों को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि बदलते समय में भाषा और जीवन शैली तेजी से बदल रही है। ऐसे दौर में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की जिम्मेदारी समाज, शिक्षकों और अभिभावकों सभी की है। संस्कृत को बढ़ावा देकर संस्कार निर्माण की दिशा में मजबूत कदम उठाया जा सकता है।

उपाध्याय ने विद्यार्थियों को पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए संत गुरूमुखराम महाराज की प्रेरणा से किए गए सेवा कार्य की सराहना करते हुए उनके प्रति नमन एवं कृतज्ञता व्यक्त की।

तीन विद्यार्थियों का अभिनंदन, बालिकाओं को मिला पुरस्कार

समारोह में इसी वर्ष विद्यालय से परीक्षा उत्तीर्ण कर एसटीसी में प्रवेश प्राप्त करने वाले तीन विद्यार्थियों का अभिनंदन किया गया। बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी खूब तालियां बटोरीं। उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए बालिकाओं को नकद पारितोषिक प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया गया।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि संत मस्तराम महाराज, वाणी पाठी कैलाश चंद्र तोषनीवाल, रामद्वारा व्यवस्थापक रामबक्ष दाखेड़ा, समाजसेवी रामस्वरूप काबरा, महाप्रभु कन्यापीठ के प्राचार्य डॉ. ओमप्रकाश कुमावत, रामप्रकाश सोनी, जयराम नेपाली एवं पत्रकार मूलचन्द पेसवानी सहित अन्य गणमान्यजन मौजूद रहे।

पुस्तक से पाठ तक और पाठ से संस्कार तक

कार्यक्रम के अंत में प्रधानाचार्य परमेश्वर सुथार ने सभी अतिथियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विद्यालय में संस्कृत भाषा के उन्नयन के लिए किए जा रहे नवाचारों की जानकारी दी तथा विद्यार्थियों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए संत गुरूमुखराम महाराज के प्रति आभार जताया।

समारोह ने एक संदेश साफ तौर पर दिया—पाठ्य पुस्तक विद्यार्थी के हाथ में ज्ञान पहुंचाती है, लेकिन संस्कृत उस ज्ञान को संस्कारों से जोड़ने का काम करती है। बदलते दौर में जब शिक्षा का अर्थ केवल रोजगार तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे आयोजन याद दिलाते हैं कि शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य बेहतर इंसान और संस्कारित समाज का निर्माण भी है। शाहपुरा के इस संस्कृत विद्यालय में गुरुवार को पुस्तकों के वितरण के साथ इसी सोच की नई इबारत लिखी गई।

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