मोह-माया की सीमाओं से निकलकर समूची धरा से प्रेम करना ही सच्ची दया और भक्ति संत नवनिधराम
रामनिवास धाम में रामस्नेही संप्रदाय की परंपरानुसार चातुर्मास का विधि-विधान से समापन, सत्संग और सेवा के संकल्प के साथ गूंजा प्रेम, करुणा और समभाव का संदेश

मोह-माया की सीमाओं से निकलकर समूची धरा से प्रेम करना ही सच्ची दया और भक्ति संत नवनिधराम
रामनिवास धाम में रामस्नेही संप्रदाय की परंपरानुसार चातुर्मास का विधि-विधान से समापन, सत्संग और सेवा के संकल्प के साथ गूंजा प्रेम, करुणा और समभाव का संदेश
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
रामस्नेही संप्रदाय की मुख्यपीठ रामनिवास धाम में चातुर्मास की आध्यात्मिक साधना, सत्संग और आराधना का क्रम परंपरागत विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। इस आध्यात्मिक प्रवास के समापन अवसर पर बारादरी में सर्व रामस्नेही सत्संगीजनों की उपस्थिति में विशेष समारोह आयोजित किया गया। कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज एवं संत मस्तराम महाराज का चातुर्मास यहां संपन्न हुआ। समारोह में गादीजी की आरती-वंदना के साथ चातुर्मास समापन की घोषणा की गई। इस अवसर पर संतवाणी के माध्यम से मोह-माया से ऊपर उठकर समूची सृष्टि के प्रति प्रेम, करुणा और समभाव रखने का संदेश दिया गया।

रामनिवास धाम की आध्यात्मिक परंपरा में चातुर्मास केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना, सदाचार और लोकसेवा के संकल्प को मजबूत करने का अवसर माना जाता है। इस अवधि में गुरु और आराध्य की स्तुति, जप-तप, सत्संग तथा कथा-प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन के वास्तविक उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। चातुर्मास के समापन पर भी यही भाव प्रमुखता से सामने आया कि आध्यात्मिक साधना की सार्थकता तभी है, जब उसका प्रभाव मनुष्य के व्यवहार और समाज के प्रति उसके दायित्वों में दिखाई दे।
मेरी वस्तु का मोह ही माया, सबको प्रेम देना ही दया-
समारोह में कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज ने अपने प्रवचन में जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि मोह-माया में उलझे रहना ही अज्ञान है। किसी वस्तु को मेरी वस्तु मानकर उससे अत्यधिक लगाव रखना माया है। जब मनुष्य का प्रेम केवल अपने परिवार, अपने परिचितों और अपने सीमित दायरे तक सिमट जाता है, तब वह व्यापक करुणा के भाव से दूर हो जाता है।
संत नवनिधराम महाराज ने कहा कि केवल अपने लोगों से प्रेम करना माया है। देश के लोगों से प्रेम करना भी इसी सीमित भाव का विस्तार है, जबकि समूची धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों और सभी धर्मों के लोगों के प्रति समान प्रेम रखना ही दया और भक्ति का वास्तविक स्वरूप है।
उनकी वाणी का मूल भाव था कि प्रेम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रत्येक प्राणी के प्रति संवेदना, सम्मान और सद्भाव रखने में प्रकट होती है। मनुष्य जब अपने-पराए की दीवारों से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता को अपनाता है, तभी उसकी साधना व्यापक अर्थ प्राप्त करती है।
चातुर्मास की परंपरा में साधना के साथ लोककल्याण का भाव-
संत नवनिधराम महाराज ने कहा कि रामस्नेही संप्रदाय में चातुर्मास की परंपरा का लंबा इतिहास रहा है। इस अवधि में गुरु और आराध्य की स्तुति, जप-तप, आराधना, सत्संग तथा कथा जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इन आयोजनों से समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिलता है और जीवन में सद्भाव, संयम तथा सेवा के संस्कार मजबूत होते हैं।
चातुर्मास का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं का निर्वहन करना नहीं, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर झांकने, विचारों को निर्मल बनाने और दूसरों के प्रति अपने व्यवहार को बेहतर करने की प्रेरणा देना भी है। संत परंपरा में साधना के साथ सेवा को महत्व देने का यही भाव रामनिवास धाम की गतिविधियों में भी दिखाई देता है।
वर्ष 2011 से सेवा के कार्यों की अनवरत परंपरा-
संत नवनिधराम महाराज ने शाहपुरा में वर्ष 2011 से संचालित सेवा गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीजी महाराज की जयंती एवं निर्वाण महोत्सव के आयोजन के साथ उनकी स्मृति में जरूरतमंदों को राशन सामग्री, कंबल और पाठ्यसामग्री वितरित करने सहित अनेक सेवा कार्य किए जाते रहे हैं। रामस्नेही अनुरागियों के सहयोग और प्रेरणा से प्रारंभ हुए ये आयोजन समय के साथ शाहपुरा की धार्मिक और सामाजिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं।
इन सेवा कार्यों के पीछे जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने और समाज में परस्पर सहयोग की भावना मजबूत करने का उद्देश्य रहा है। राशन सामग्री से किसी जरूरतमंद परिवार को सहारा मिलता है, कंबल वितरण से जरूरतमंदों को राहत मिलती है और विद्यार्थियों को पाठ्यसामग्री उपलब्ध कराने से उनकी शिक्षा की राह आसान होती है। इस प्रकार धार्मिक आस्था लोककल्याण से जुड़कर सेवा के व्यावहारिक रूप में सामने आती है।
संत नवनिधराम महाराज ने विश्वास व्यक्त किया कि शाहपुरा सहित विभिन्न स्थानों के रामस्नेही अनुरागियों के सहयोग से ये सेवा गतिविधियां भविष्य में भी निरंतर जारी रहेंगी। उन्होंने सेवा के इस क्रम को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
संतवाणी के साथ सेवा-संकल्प का संदेश-
चातुर्मास समापन समारोह में गादीजी की आरती-वंदना के दौरान श्रद्धालुओं ने श्रद्धा के साथ भाग लिया। समारोह ने एक बार फिर रामस्नेही संप्रदाय की उस परंपरा को रेखांकित किया, जिसमें आध्यात्मिक साधना के साथ मानवीय संवेदना और लोकसेवा को भी महत्व दिया जाता है।
इस अवसर पर सूर्यप्रकाश बिड़ला, कैलाशचंद्र तोषनीवाल, रामेश्वरलाल बसेर, राकेश सोमाणी, रामकल्याण सोमाणी, दीनदयाल मारू, महावीर जागेटिया, रामसहाय बिड़ला सहित अनेक रामस्नेही अनुरागी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
रामनिवास धाम में चातुर्मास का समापन भले ही धार्मिक परंपरा के एक निर्धारित क्रम की पूर्णता हो, लेकिन संतवाणी का संदेश जीवन में निरंतर साधना और सेवा की प्रेरणा देता है। अपनेपन के संकुचित दायरे से बाहर निकलकर समूची मानवता के प्रति प्रेम रखना, जरूरतमंदों की सहायता करना और सभी धर्मों के लोगों के प्रति सद्भाव बनाए रखना ही उस भक्ति का सार है, जो मनुष्य को भीतर से निर्मल बनाकर समाज को अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाने की राह दिखाती है।




