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‘विधायकों की जन्मभूमि’ में शिक्षा बेबस, हिन्दी माध्यम बंद होने से गांव के बच्चों का भविष्य अधर में

कनेछन कलां में कक्षा 6 से 12 तक हिन्दी माध्यम नहीं, 17 किलोमीटर दूर पढ़ने को मजबूर छात्र; छात्रावास की सीटें भी हो रहीं खाली

  • छह विधायक देने वाला गांव, लेकिन बच्चों के लिए नहीं हिन्दी माध्यम की पढ़ाई

  • जनप्रतिनिधियों की धरती पर शिक्षा का संकट, 17 किमी दूर पढ़ने को मजबूर छात्र

  • राजनीति में अव्वल, शिक्षा में पिछड़ा कनेछन कलां; हिन्दी माध्यम के लिए तरस रहे विद्यार्थी

  • विद्यालय हैं, छात्रावास हैं… फिर भी गांव के बच्चों के लिए नहीं हिन्दी माध्यम

  • ‘विधायक नगरी’ की सबसे बड़ी विडंबना: अपने गांव में नहीं मिल रही मातृभाषा में शिक्षा

शाहपुरा। शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र का कनेछन कलां गांव राजनीतिक दृष्टि से जितना समृद्ध माना जाता है, शिक्षा के क्षेत्र में उतना ही उपेक्षित दिखाई दे रहा है। यह वही गांव है जिसे पूरे क्षेत्र में “विधायक नगरी” के नाम से जाना जाता है। इस गांव की मिट्टी ने अब तक छह जनप्रतिनिधियों को विधानसभा तक पहुंचाया है, लेकिन विडंबना यह है कि आज इसी गांव के बच्चों को अपनी मातृभाषा हिन्दी में शिक्षा प्राप्त करने के लिए गांव छोड़कर दूसरे कस्बों का रुख करना पड़ रहा है।

गांव में महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, राजकीय बाल उच्च माध्यमिक विद्यालय, राजकीय प्राथमिक विद्यालय, कस्तूरबा गांधी आवासीय छात्रावास तथा श्री अम्बेडकर राजकीय समाज कल्याण छात्रावास जैसी शैक्षणिक संस्थाएं संचालित हैं। पहली नजर में यह व्यवस्था पर्याप्त प्रतीत होती है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। ग्राम पंचायत मुख्यालय होने के बावजूद यहां कक्षा 6 से 12 तक हिन्दी माध्यम में अध्ययन की कोई व्यवस्था नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय को महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) में परिवर्तित किए जाने के बाद हिन्दी माध्यम की पढ़ाई पूरी तरह समाप्त हो गई। इसका सीधा असर ग्रामीण विद्यार्थियों पर पड़ा। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अनेक छात्र अंग्रेजी माध्यम में अध्ययन जारी नहीं रख सके और उन्हें या तो दूसरे शहरों में प्रवेश लेना पड़ा अथवा पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

स्थिति यह है कि गांव के विद्यार्थियों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर की हिन्दी माध्यम की शिक्षा के लिए 17 किलोमीटर दूर शाहपुरा अथवा 10 किलोमीटर दूर फूलियाकलां जाना पड़ता है। रोजाना आने-जाने की कठिनाई, अतिरिक्त आर्थिक बोझ और परिवहन की समस्या के कारण हर वर्ष कई विद्यार्थी विद्यालय छोड़ने को विवश हो रहे हैं। शिक्षा विशेषज्ञ इसे ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ते ड्रॉपआउट का एक प्रमुख कारण मान रहे हैं।

इस समस्या का असर केवल विद्यार्थियों पर ही नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। गांव में संचालित श्री अम्बेडकर राजकीय समाज कल्याण छात्रावास में करीब 25 सीटें खाली पड़ी हैं। वहीं कक्षा 11वीं और 12वीं में हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों माध्यमों में विद्यार्थियों की संख्या शून्य होना क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

ग्राम पंचायत प्रशासक गीता देवी गुर्जर ने बताया कि कनेछन कलां पंचायत मुख्यालय होने के बावजूद विद्यार्थियों के लिए कक्षा 6 से 12 तक हिन्दी माध्यम उपलब्ध नहीं होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए ग्रामीणों के साथ मिलकर स्थानीय विधायक, सांसद तथा राजस्थान सरकार के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री को व्यक्तिगत रूप से अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार शीघ्र इस दिशा में सकारात्मक निर्णय लेकर विद्यार्थियों को राहत प्रदान करेगी।

समग्र शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष रामधन बैरवा का कहना है कि कनेछन कलां जैसे बड़े पंचायत मुख्यालय पर हिन्दी माध्यम की पढ़ाई अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय भवन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को उनकी आवश्यकता और सुविधा के अनुरूप अध्ययन का माध्यम भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षा विभाग से मांग की कि महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय कनेछन कलां में अंग्रेजी माध्यम के साथ-साथ हिन्दी माध्यम भी पुनः प्रारंभ किया जाए, ताकि ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों को अपने ही गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

ग्रामीणों का मानना है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में अधिक संख्या में विद्यार्थी शिक्षा से विमुख होंगे और इसका दुष्प्रभाव पूरे क्षेत्र के सामाजिक एवं शैक्षणिक विकास पर पड़ेगा। उनका कहना है कि जिस गांव ने प्रदेश को छह विधायक दिए, वहां के बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा के लिए दर-दर भटकना पड़े, यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

अब क्षेत्रवासियों की निगाहें राज्य सरकार और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि “विधायक नगरी” के बच्चों को अपने गांव में हिन्दी माध्यम की शिक्षा का अधिकार कब तक मिल पाता है।

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