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देवर्षि नारद समस्त महापुरुषों के आद्य आचार्य, उन्हीं से प्रवाहित हुई ज्ञान की धारा – संत नवनिधराम महाराज

आचार्य परंपरा की महिमा से गूंजा रामनिवास धाम, संत नवनिधराम ने सुनाया नारद महात्म्य

शाहपुरा। रामस्नेही संप्रदाय की मुख्यपीठ रामनिवास धाम, शाहपुरा में चल रहे पावन चातुर्मास प्रवचनों की श्रृंखला में शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज ने कथा-वाचन के दौरान गुरु-शिष्य परंपरा, आचार्य परंपरा तथा देवर्षि नारद के दिव्य व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतवर्ष में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन सभी के आद्य आचार्य देवर्षि नारद हैं। ज्ञान, भक्ति और धर्म की जो अविरल धारा प्रवाहित हुई, उसका मूल स्रोत नारदजी ही हैं।
संत नवनिधराम महाराज ने नारद पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि देवर्षि नारद केवल एक ऋषि या देवदूत नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार स्तंभ हैं। वे समस्त शास्त्रों के परम पंडित, धर्म के उपदेशक, सद्गुणों के भंडार और अपार तेजस्विता के प्रतीक थे। उनका जीवन सदाचार, करुणा, लोककल्याण और निष्काम भक्ति का अनुपम उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि देवर्षि नारद समस्त वेदों के तत्त्वज्ञ, इतिहास और पुराणों के मर्मज्ञ, धर्मतत्त्व के ज्ञाता तथा शिक्षा, व्याकरण, संगीत और नीति के अप्रतिम विद्वान थे। वे ऐसे महान आचार्य थे जो जटिल से जटिल शंकाओं का समाधान सहजता से कर देते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के कल्याण का मार्ग भी उन्होंने अपने उपदेशों से प्रशस्त किया।
प्रवचन के दौरान संत नवनिधराम महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला प्रकाश स्तंभ होता है। गुरु के सान्निध्य में ही व्यक्ति आत्मज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि आज के भौतिकतावादी युग में जब जीवन अनेक प्रकार के भ्रम और विकर्षणों से घिरा हुआ है, तब सच्चे गुरु, आचार्य और संत का सान्निध्य पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। वही मनुष्य को तत्वज्ञान का बोध कराकर उसके जीवन को सार्थक, अनुशासित और कल्याणकारी बनाते हैं।
प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के आध्यात्मिक संदेशों ने उपस्थित जनसमुदाय को भारतीय संस्कृति, गुरु-भक्ति और ज्ञान परंपरा के प्रति नई प्रेरणा प्रदान की।

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