
- शिव कथा में गूंजे संस्कार, राष्ट्रभक्ति और शिवभक्ति के स्वर
- शिव महापुराण बनी जीवन निर्माण की पाठशाला, विद्यार्थियों को मिला आदर्श जीवन का मंत्र
- शिवभक्ति के साथ राष्ट्रसेवा का संदेश, पार्वती विदाई प्रसंग ने भावुक कर दिया कथा पंडाल
- जब शिव कथा ने सिखाया—संस्कार, सेवा और राष्ट्रभक्ति ही जीवन का सच्चा मार्ग
शाहपुरा। श्री शिव महापुराण कथा के सप्तम दिवस शाहपुरा का वातावरण श्रद्धा, भक्ति, संस्कार और राष्ट्रचेतना से अनुप्राणित दिखाई दिया। कथा स्थल पर एक ओर भगवान भोलेनाथ के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दिव्य अभिषेक और शिवनाम संकीर्तन की गूंज रही, तो दूसरी ओर विद्यार्थियों को आदर्श जीवन, राष्ट्रभक्ति और भारतीय संस्कृति के मूल्यों का संदेश दिया गया। दिनभर चले धार्मिक आयोजन में शिवभक्ति के साथ सामाजिक जागरूकता, नशामुक्ति और पारिवारिक संस्कारों का अनूठा समन्वय देखने को मिला।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रतिदिन की भांति रुद्राक्ष से निर्मित शिवलिंग के सहस्त्रार्चन से हुई। भगवान शिव के 1108 पवित्र नामों के उच्चारण के साथ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दुग्ध, दही, घृत, मधु, गंगाजल सहित विभिन्न पवित्र द्रव्यों से विशेष अभिषेक किया गया। श्रीनाथजी भक्त मंडल के सदस्यों ने सामूहिक रूप से भगवान भोलेनाथ का पूजन-अर्चन कर देश, प्रदेश, समाज और समस्त विश्व के सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की। पूरे कथा परिसर में “हर-हर महादेव” और “ॐ नमः शिवाय” के जयघोष से वातावरण शिवमय हो उठा।
इसके बाद आदर्श विद्या मंदिर, शाहपुरा के छात्र-छात्राएं कथा स्थल पहुंचे। पूज्य कथा व्यास महाराज श्री ने विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्रवान, संस्कारी और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाला आदर्श नागरिक बनना है। उन्होंने विद्यार्थियों से माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करने, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता का नियमित अध्ययन करने तथा अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि भारत का गौरव उसके महापुरुषों के आदर्शों में निहित है। विद्यार्थियों को स्वामी विवेकानंद की आत्मविश्वासपूर्ण सोच, महाराणा प्रताप के स्वाभिमान, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के राष्ट्रसमर्पण, रानी लक्ष्मीबाई के साहस तथा भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
धार्मिक आयोजन में सामाजिक सरोकारों की भी प्रभावी झलक दिखाई दी। ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, शाहपुरा से पधारी बहन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि नशा वर्तमान समय की सबसे गंभीर सामाजिक बुराइयों में से एक है, जो व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों को कमजोर करता है। उन्होंने सभी से स्वयं नशे से दूर रहने और अपने आसपास के लोगों को भी इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने का आह्वान किया। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं को तन, मन, धन, समय और अपनी शक्तियों का सदुपयोग करते हुए नशामुक्त, स्वस्थ और विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय योगदान देने का सामूहिक संकल्प भी दिलाया गया।
कथा प्रवचन के दौरान पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव के नाम-स्मरण की महिमा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष जैसे मानसिक विकार मनुष्य को ईश्वर से दूर ले जाते हैं, जबकि शिवभक्ति, सत्संग और सदाचार इन विकारों से मुक्ति का सरल एवं प्रभावी मार्ग हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से जीवन में संतोष, सेवा, करुणा और शिवभक्ति को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यही सच्चे सुख और आत्मिक शांति का आधार है।
सप्तम दिवस का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब कथा में भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह उपरांत विदाई प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया गया। माता मेना और पुत्री पार्वती के वात्सल्य, ममता, स्नेह और विरह का ऐसा भावपूर्ण चित्रण हुआ कि कथा पंडाल में उपस्थित अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। पूज्य महाराज श्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बेटी की विदाई केवल एक सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, संस्कार और परिवार की भावनात्मक एकता का जीवंत प्रतीक है।
पूरे कथा दिवस में वैदिक मंत्रोच्चार, शिवनाम संकीर्तन और भक्तिमय वातावरण ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर धर्म, संस्कार, राष्ट्रसेवा और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।




