
भीलवाड़ा, । अपना सर्वस्व परमात्मा को समर्पित कर देने से बढ़कर भक्ति नहीं हो सकती। परमात्मा ही हमे जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर सकता है। परमात्मा को साक्षी मान कर अपने जीवन के कदम धर्म के साथ बढ़ाना चाहिए।
परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग सद्गुरू बताते है। धरती के मार्ग से ही भक्ति का मार्ग है ,ओर जो व्यक्ति धरती से जुड़ा होता है उसकी पहुंच आकाश तक होती है।
ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने गुरूवार को ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि धर्म से जुड़ो, संस्कृति से जुड़ो पर विकृति से मत जुड़ो। विकृति थोड़ी देर का हल्ला बोल है,पर संस्कृति अमिट आनंद है। भक्ति के मार्ग अलग-अलग हो सकते पर भक्ति में कोई भेद नहीं होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि भक्ति का अर्थ सेवा करना होता है, ओर सेवा प्रदर्शन का विषय नहीं होकर दर्शन है। भक्ति के मार्ग पर निरन्तर चलना होता है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम परमात्मा का कार्य करते हुए भी संसार की तरफ देखते है। ठाकुरजी के समक्ष खड़े है तो हमारा पूरा ध्यान उन पर ही केन्द्रित रहना चाहिए। जो परमात्मा की तरफ ही देखता है उस पर सद्गुरू की भी कृपा होती है ओर वह निहाल हो जाता है।

उन्होंने कहा कि स्वामी श्रीरामचरणजी महाराज ने भक्ति की गहराई को छुआ था। हमारे ह्दय में गुरू का ध्यान हो तब भक्ति का मंगलाचरण होता है। हमारी सुनने की आदत कमजोर हो रही है जबकि सुनने की आदत मजबूत होनी चाहिए।
श्रवण भक्ति मजबूत होनी चाहिए, ये भक्ति की नींव होती है। आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि हमे संसार की नहीं परमात्मा की सुनना है। जो परमात्मा की सुनता है उसकी बात परमात्मा भी सुनता है।
भक्ति की अद्भुत विशेषताएं है जिसके जीवन में भक्ति छा जाती है वह संसार सागर से पार जा सकता है।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस जी ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।




