फूटी बाल्टी जैसा मन संतोष से ही भर सकता है, ‘ओर’ नहीं ‘बस’ बोलना सीखो-पुलकसागर महाराज
एक गलत विचार रिश्तों पर फेर सकता है पानी

भीलवाड़ा, मूलचन्द पेसवानी
इंसान के तन का पेट तो भोजन से भर सकता है, लेकिन मन का पेट कितना भी भरने की कोशिश करो, वह खाली ही रहता है। मन उस फूटी बाल्टी के समान है, जिसमें समुद्र का सारा पानी डाल दिया जाए, फिर भी वह कभी नहीं भर सकती। मन की इस फूटी बाल्टी में यदि संतोष का पैंदा लगा दिया जाए तो जीवन आनंद से भर सकता है। सांसारिक सुखों की मृगमरीचिका के पीछे भागता इंसान पूरी जिंदगी दौड़ता रहता है, लेकिन सच्चे सुख की तलाश पूरी नहीं हो पाती।
यह बात राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज ने बुधवार को भीलवाड़ा में पहली बार हो रहे अपने चातुर्मास के दौरान श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से चित्रकूटधाम में आयोजित ज्ञान गंगा महोत्सव में प्रवचन करते हुए कही।
आचार्यश्री ने संतोष को जीवन का सबसे बड़ा धन बताते हुए कहा कि जिसने संतोष पा लिया, उसे दुनिया के किसी दूसरे धन की जरूरत नहीं रहती। जिसके जीवन में संतोष नहीं है, उसके मन की फूटी बाल्टी कोई भी नहीं भर सकता। उन्होंने जीवन को सुखी बनाने का बेहद सरल मंत्र देते हुए कहा कि दो शब्द हमेशा याद रखें—दुःखी होना है तो ‘और’ और सुखी होना है तो ‘बस’।
उन्होंने कहा कि ‘और’ शब्द में कोई फुलस्टॉप नहीं होता। आज यह चाहिए तो कल कुछ और चाहिए, फिर उससे भी अधिक की चाहत पैदा हो जाती है। इंसान इसी ‘और’ के फेर में पूरी जिंदगी भटकता रहता है। इसके विपरीत जिसने ‘बस’ कहना सीख लिया, उसके जीवन में संतोष का प्रवेश हो जाता है। ‘और’ फूटी बाल्टी का प्रतीक है तो ‘बस’ संतोष का।
पर्णकुटी में भी आनंद, महलों में भी अशांति
पुलकसागर महाराज ने कहा कि संतोष रूपी धन जिसके जीवन में आ गया, वह पर्णकुटी में भी आनंदपूर्वक रह सकता है और जिसके जीवन में संतोष नहीं है, वह महलों में रहकर भी बेचैन रहेगा। परमात्मा से लगातार ‘और’ मांगकर दुखी होने की बजाय जो मिला है, उसमें संतोष करना सीखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मन को कितना भी भरने का प्रयास कर लो, वह हमेशा खाली ही दिखाई देता है। प्यास बुझाने के लिए दो बूंद पानी पर्याप्त हो सकता है, लेकिन इंसान कई बार अपनी पूरी जिंदगी समुद्र तलाशने में लगा देता है। इच्छाएं दुनिया में किसी की पूरी नहीं हो सकतीं। इसलिए मृत्यु के बाद स्वर्ग की कल्पना करने के बजाय जीते-जी अपने जीवन को स्वर्ग बनाना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि जो नहीं मिला, उसके लिए आंसू बहाने से बेहतर है कि जो मिला है, उसके लिए परमात्मा का धन्यवाद किया जाए और उसका आनंदपूर्वक उपयोग किया जाए। जीवन में उपलब्धियों की गिनती करने से ज्यादा जरूरी है कि उपलब्ध चीजों के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा किया जाए।
एक गलत विचार रिश्तों पर फेर सकता है पानी
आचार्य पुलकसागर महाराज ने मन में नकारात्मक और गलत विचारों को स्थान नहीं देने की अपील करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के प्रति मन में आया एक गलत विचार पूरी जिंदगी के रिश्तों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जब भी मन में गलत विचार आए, उसे वहीं कुचल देना चाहिए और उसे पल्लवित नहीं होने देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक गलत विचार वर्षों पुराने रिश्ते और दोस्ती पर पानी फेर सकता है। यही गलत विचार भक्त और भगवान के रिश्ते में भी दूरी पैदा कर सकता है। विचार बदलते हैं तो आचरण बदलता है और आचरण बदलने के बाद सोच बदल जाती है। इसके बाद परिस्थितियां वही रहती हैं, लेकिन व्यक्ति का जीवन सुख से दुख की ओर चला जाता है।
उन्होंने कहा कि एक बुराई कई अच्छाइयों को मिटा देती है। इसलिए हमेशा सामने वाले की कमियां खोजने की बजाय उसकी अच्छाइयों को देखने का प्रयास करें। यदि नजर सद्भाव पर होगी तो दुनिया स्वर्ग जैसी लगेगी और यदि नजर अभाव पर रहेगी तो यही दुनिया नरक बन जाएगी। इसलिए अपनी दृष्टि को अंधेरे के बजाय उजाले पर केंद्रित रखना चाहिए।
कल की चिंता में आज मत गंवाओ
आचार्यश्री ने कहा कि चिता मुर्दे को जलाती है, लेकिन चिंता जीते-जी इंसान को खोखला कर देती है। व्यक्ति को अपनी जिंदगी के अगले पल की खबर नहीं होती, लेकिन वह सौ वर्ष का सामान जुटाने में लगा रहता है। शरीर की बीमारी का उपचार संभव है, लेकिन मन की बीमारी का कोई आसान उपचार नहीं।
उन्होंने कहा कि जिंदगी में कल की चिंता छोड़कर आज में जीना सीखना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए धन जुटाने की होड़ में अपना वर्तमान खराब करने की बजाय वर्तमान को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा—“पूत कपूत तो धन संचय क्यों और पूत सपूत तो धन संचय क्यों।” संतान योग्य है तो कुछ छोड़े बिना भी वह अपना जीवन संभाल लेगी और यदि संतान कपूत है तो कितना भी धन छोड़कर जाएं, वह उसे सुख नहीं दे पाएगा।
पुलकसागर महाराज ने कहा कि दुनिया में हमेशा वही नहीं होता जो हम चाहते हैं। कई बार वही होता है जो परमात्मा चाहता है। इसलिए यदि परमात्मा की इच्छा पर विश्वास है तो हमें वही करना चाहिए जो परमात्मा चाहता है। जब ऐसा होगा तो अंततः वही होगा, जिसकी हम सच्चे अर्थों में कामना करते हैं।
18 दिन गूंजेगी पर्युषण की आराधना
आचार्यश्री ने आगामी पर्युषण महापर्व का उल्लेख करते हुए कहा कि अब त्याग और तपस्या की गंगा प्रवाहित होने वाली है। पहले आठ दिन श्वेताम्बर जैन समाज और इसके बाद दस दिन दिगम्बर जैन समाज पर्युषण महापर्व मनाएगा।
उन्होंने कहा कि कई लोग सवाल करते हैं कि दोनों समाज पर्युषण अलग-अलग क्यों मनाते हैं। मेरा जवाब है कि यदि दोनों एक साथ मनाएं तो दस दिन ही पर्युषण होंगे, लेकिन अलग-अलग मनाने से 18 दिन तक पर्युषण पर्व की आराधना होगी। इस बार मेरा चातुर्मास भीलवाड़ा में है, इसलिए यहां 18 दिन तक पर्युषण की आध्यात्मिक ऊर्जा और आराधना का वातावरण बनेगा। उन्होंने भावपूर्ण अंदाज में कहा कि “उनके पर्युषण भी हमारे होंगे और हमारे पर्युषण भी उनके होंगे।”
दीप प्रज्वलन से हुआ प्रवचन का शुभारंभ
प्रवचन से पूर्व दीप प्रज्वलन, आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य महेन्द्रकुमार, दीपक एवं दिवित सोगानी परिवार ने प्राप्त किया। समाजसेवी गोविन्द सोड़ाणी ने आचार्यश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी, संयोजक मनीष शाह, सह संयोजक लोकेश अजमेरा सहित पदाधिकारियों ने सौभाग्यशाली परिवार एवं अतिथियों का स्वागत किया। त्रिशला महिला मंडल की सदस्यों ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। आठ वर्षीय बालिका तक्ष्वी सोड़ाणी ने शिवपुराण मंत्रों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भावविभोर किया। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह ने किया।
चित्रकूटधाम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
ज्ञान गंगा महोत्सव में भीलवाड़ा शहर सहित आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से सर्व समाज के हजारों श्रद्धालु चित्रकूटधाम पहुंचे और आचार्यश्री के प्रवचनों की ज्ञान गंगा में डुबकी लगाई। चातुर्मास के दौरान चित्रकूटधाम आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
ज्ञान गंगा महोत्सव के तहत 30 अगस्त तक प्रतिदिन सुबह 8.30 से 10 बजे तक चित्रकूटधाम में आचार्यश्री के प्रवचन होंगे। वहीं शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है। इसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचकर धर्मलाभ ले रहे हैं।
आचार्य पुलकसागर महाराज के प्रवचनों का मूल संदेश यही रहा कि जीवन को सुखी बनाने के लिए संसार बदलने की नहीं, अपनी दृष्टि, विचार और इच्छाओं को बदलने की जरूरत है। मन की फूटी बाल्टी को ‘और’ से नहीं, संतोष के ‘बस’ से ही भरा जा सकता है।




