
भीलवाड़ा, 7 सितंबर। जीवन में संगति का असर इतना गहरा होता है कि गलत व्यक्ति का साथ पूरे जीवन को संकट में डाल सकता है। रावण और कंस का साथ देने वालों का भी अंत सुखद नहीं हुआ। इसलिए मनुष्य को जीवन में दुर्जन और अज्ञानी की संगति से बचते हुए विवेक, संयम और सत्संग का मार्ग अपनाना चाहिए।
यह बात अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने सोमवार को ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में कही।
आचार्यश्री ने अपनी सहज और व्यावहारिक शैली में कहा कि गलती जुबान करती है, लेकिन सजा कई बार दांतों को भुगतनी पड़ती है। जुबान की असली सार्थकता स्वाद लेने में नहीं, बल्कि भगवान का भजन करने में है। उन्होंने कहा कि जिसने जीवन में स्वाद और विवाद दोनों को जीत लिया, उसने मानो दुनिया जीत ली।
थाली पर जुबान कर देती है महाभारत
आचार्यश्री ने कहा कि जुबान को स्वाद पेट भरने के बाद ही याद आता है, भूखे पेट व्यक्ति को स्वाद की चिंता नहीं रहती। घरों में भी कई बार यही जुबान भोजन की थाली पर महाभारत खड़ी कर देती है। उन्होंने कहा कि भोजन पाने वाला और भोजन परोसने वाला यदि भोजन के समय मौन रहकर भोजन करे तो घर का वातावरण सुखद बनेगा और घर स्वर्ग जैसा हो सकता है।
उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए। शब्दों का चयन और बोलने का तरीका ही कई बार रिश्ते बनाने और बिगाड़ने का कारण बन जाता है।
इसी धरती पर स्वर्ग और नरक
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि स्वर्ग और नरक कहीं दूर नहीं हैं, मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर इसी धरती पर इनके फल का अनुभव करता है। पुण्य का फल सुख और पाप का फल दुख के रूप में सामने आता है।
उन्होंने कहा कि शास्त्र दर्पण के समान होते हैं। दर्पण वही दिखाता है जो सामने होता है, उसी तरह शास्त्र भी जीवन का वास्तविक स्वरूप बताते हैं। लेकिन यदि व्यक्ति के पास विवेक ही नहीं है तो परमात्मा, गुरु और शास्त्र भी उसका क्या कर सकते हैं। आत्मजागरण होने पर ही मनुष्य विवेकवान बनता है।
सड़क और शिक्षक दोनों मंजिल तक पहुंचाते हैं
आचार्यश्री ने जीवन में शिक्षा और मार्गदर्शन की महत्ता बताते हुए कहा कि सड़क और शिक्षक एक समान होते हैं। सड़क पर चलने वाला व्यक्ति मंजिल तक पहुंचता है और शिक्षक के मार्गदर्शन में चलने वाला विद्यार्थी भी अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है।
धर्म से दूर हुए माता-पिता तो संस्कारों से दूर होंगे बच्चे
आचार्य रामदयालजी महाराज ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सनातन धर्म कमजोर हो रहा है तो इसके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। माता-पिता कमाई और भौतिक जीवन की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि रामद्वारा जैसे धर्मस्थलों पर आना-जाना कम हो गया है। इसका असर बच्चों के संस्कारों पर पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कारवान बनाने की पहली जिम्मेदारी माता-पिता की है। यदि बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाएंगे तो आने वाली पीढ़ी सुरक्षित और मजबूत होगी।
पिज्जा-बर्गर नहीं, सात्विक भोजन देगा सात्विक विचार
आचार्यश्री ने बच्चों के खान-पान पर भी गंभीर संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हमारे यहां भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है, लेकिन पिज्जा और बर्गर भारत के पारंपरिक पकवान नहीं हैं। इसके बावजूद माता-पिता लाड़-प्यार में बच्चों को ऐसा आहार खिला रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जैसा खान-पान होगा, वैसा ही मन बनेगा। सात्विक आहार से सात्विक वृत्ति और सात्विक विचार पैदा होते हैं। इसलिए बच्चों के भोजन और दिनचर्या पर माता-पिता को विशेष ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने बताया कि रामस्नेही परंपरा के अनुसार एकादशी के अवसर पर चातुर्मास का आधा काल सानंद पूरा हो रहा है।
संत मनोरथराम ने किया मानस प्रवचन
दैनिक सत्संग में आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। संत प्रीतमरामजी सहित श्रद्धालुओं ने भजनों की प्रस्तुति दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की।
एकादशी के अवसर पर दोपहर 3 से 4 बजे तक वितराग महाराज के भजन हुए। सूर्यास्त के समय संध्या आरती हुई। रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल कथा का आयोजन भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

13 से विराट श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह
आचार्यश्री रामदयालजी महाराज ने बताया कि ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत रामद्वारा में 13 से 20 सितंबर तक विराट श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह का आयोजन किया जाएगा। आयोजन को लेकर व्यापक तैयारियां चल रही हैं।
इस दौरान भागवत भक्ति, भक्त और भगवान तथा जीवन दर्शन से जुड़े विषयों पर प्रवचन होंगे। आयोजन का सबसे विशेष आकर्षण 108 श्रीमद्भागवत के मूल पाठ का ऐतिहासिक आयोजन रहेगा। पुष्कर से आने वाले 108 वेदपाठी विद्वान पंडित भागवत का मूल पाठ करेंगे। इन 108 भागवतों का पूजन 108 यजमान परिवारों द्वारा किया जाएगा।
दो पालियों में होगी भागवत कथा
आयोजन के दौरान प्रतिदिन सुबह 8.30 से 10.30 बजे तथा दोपहर 2 से 4 बजे तक श्रीमद्भागवत कथा होगी। वहीं सुबह 10.30 से 11.30 बजे और शाम 4 से 5 बजे तक श्रीवाणीजी का प्रवचन होगा।
श्रीवाणीजी का प्रवचन आचार्यश्री रामदयालजी महाराज के मुखारबिंद से होगा, जबकि श्रीमद्भागवत कथा का वाचन संत मनोरथरामजी राम मचलाना करेंगे। आयोजन को लेकर रामद्वारा में श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
रिपोर्ट : मूलचन्द पेसवानी




