
भीलवाड़ा, 8 सितम्बर। तीर्थंकर परमात्मा जैसे सभी के होते हैं, वैसे ही मुनिराज भी सभी के होते हैं। उनमें किसी प्रकार का भेद करना पाप का कार्य है। साधु को केवल शिष्य बनाने से मोक्ष प्राप्त नहीं होता। धर्म के क्षेत्र में भी विकृतियां आने के कारण दुर्दशा हो रही है। साधु यदि स्वयं का प्रचार छोड़कर तीर्थंकरों का प्रचार शुरू कर दें तो समाज एकजुट हो सकता है, लेकिन जब साधु स्वयं को तीर्थंकर साबित करने की कोशिश करता है तो समाज में राजनीति शुरू हो जाती है। यह बात भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने मंगलवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन में कही।
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित प्रवचन में आचार्यश्री ने जैन समाज की एकता, पंथवाद और साधु-संतों की भूमिका पर बेबाक विचार रखे।
उन्होंने कहा कि हमें एक-दूसरे को अच्छा या खराब बताने के बजाय महावीर की प्रभावना करनी चाहिए। दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, श्रावक हो या मुनि—यदि सभी तीर्थंकरों और भगवान महावीर की आराधना करेंगे तो पंथ अपने आप समाप्त हो जाएंगे। लेकिन जब हर पंथ अपनी प्रभावना और हर व्यक्ति स्वयं की प्रभावना करते हुए खुद को अच्छा तथा दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करता है तो समाज टुकड़ों में बंट जाता है।
‘अपनी प्रभावना करें या महावीर की?’
आचार्यश्री ने कहा कि अब चिंतन का विषय यह होना चाहिए कि हम अपनी प्रभावना करें या महावीर की प्रभावना। जैन धर्म के चारों समाज मिलकर महावीर के लिए जीना शुरू कर दें तो दुनिया में हमसे बड़ी ताकत किसी के पास नहीं होगी। जब हम अपने-अपने लिए जीना शुरू करते हैं तो हमारी ताकत बंट जाती है।
उन्होंने कहा कि हमारा पंथ कोई भी हो, लेकिन महावीर के लिए एक होना चाहिए। पंथ अपने हो सकते हैं, लेकिन परमात्मा हमारा है और वह कहीं भी हो सकता है।
‘साधु के आने से समाज में आनंद बढ़े, टूटना नहीं’
पुलकसागरजी महाराज ने कहा कि कहीं भी साधु जाएं तो समाज में आनंद और एकता का भाव पैदा होना चाहिए, लेकिन आज स्थिति ऐसी हो गई है कि कई बार साधु के आने से ही समाज टूटने लगता है। जो साधु समाज में एकता नहीं ला सकता, वह धर्म और प्रेम का उपदेश कैसे देगा।
उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर राजनीति अधोगति का कारण बनती है। हमारा इष्ट और गुरु कोई भी हो सकता है, लेकिन सभी आराध्य और अधिकृत गुरुओं का सम्मान किया जाना चाहिए। जो ऐसा नहीं करते, वे मिथ्यादृष्टि होते हैं और कभी सम्यक दृष्टि नहीं हो सकते।
आचार्य, उपाध्याय और साधु की भूमिका समझाई
आचार्य पुलकसागर महाराज ने साधु परंपरा और विभिन्न भूमिकाओं की व्याख्या करते हुए कहा कि जो शिक्षा, दीक्षा और प्रायश्चित देते हैं, वे आचार्य कहलाते हैं। जो पठन-पाठन कराते हैं, वे उपाध्याय होते हैं और जो चुपचाप साधना करते हैं, वे साधु होते हैं।
उन्होंने बताया कि मुनि दो प्रकार के माने गए हैं—वनवासी और चैत्यवासी। जो वन में रहते हैं वे वनवासी तथा जो चैत्यालय, जिनालय या मंदिर आदि में रहकर साधना करते हैं, वे चैत्यवासी कहलाते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि पंचम काल में सारे मुनि चैत्यवासी हैं। वर्तमान में ऐसे कोई मुनि नहीं हैं जो एक बार वन में गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए। ऐसे मुनि चौथे काल में होते थे। कुछ दिनों के लिए जंगल में चले जाने मात्र से कोई वनवासी नहीं कहलाता। वनवासी को जिनकल्पी, अर्थात जिनेश्वर के समान और चैत्यवासी को स्थिरकल्पी कहा गया है।
उन्होंने कहा कि मुनि के मन में राग-द्वेष नहीं होते, बल्कि समता का भाव होता है।
16 से 25 सितम्बर तक पर्युषण-दशलक्षण पर्व की साधना
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस दौरान दस दिवसीय ‘पाप नाशनम शिविर’ का भी आयोजन किया जाएगा। शिविर में भाग लेने के लिए अब तक सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं पंजीयन करा चुके हैं।
प्रवचन के प्रारंभ में दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य कमलादेवी, राजकुमार एवं दिलीप गदिया परिवार ने प्राप्त किया।
चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह-संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे हैं। वहीं शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है। इसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।




