Welcome to शाहपुरा संवाद   Click to listen highlighted text! Welcome to शाहपुरा संवाद
BHILWARAE-Paperधर्मराजस्थानरामस्नेहीलोकल न्यूज़शाहपुरा

रामनाम की विश्व राजधानी है शाहपुरा-प्रधान पीठ पर भीलवाड़ा जिले के तीन संत बने आचार्य

'शाहपुरा संवाद' का गुरुपूर्णिमा विशेषांक — शोध, इतिहास और श्रद्धा का अनुपम दस्तावेज

विश्वभर में गूंज रहा है शाहपुरा का रामनाम
रामनिवास धाम से आलोकित हुई रामस्नेही परम्परा की अमर ज्योति
इतिहास के स्वर्णिम पन्नों से पहली बार सामने आया गौरवशाली तथ्य
प्रधान पीठ पर भीलवाड़ा जिले के तीन संत बने आचार्य
266 वर्षों की गुरु परम्परा, साधना, सेवा और समता की अद्भुत विरासत
‘शाहपुरा संवाद’ का गुरुपूर्णिमा विशेषांक — शोध, इतिहास और श्रद्धा का अनुपम दस्तावेज

 

मूलचन्द पेसवानी, शाहपुरा
राजस्थान की धरती सदियों से संतों, महात्माओं और आध्यात्मिक विभूतियों की तपोभूमि रही है। इसी पुण्यधरा पर स्थित शाहपुरा केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक राजधानी है जहाँ से निर्गुण-निराकार रामभक्ति की ऐसी दिव्य धारा प्रवाहित हुई, जिसने देश की सीमाओं को लांघते हुए विश्वभर में करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदयों को रामनाम से जोड़ दिया। आज शाहपुरा स्थित अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ रामनिवास धाम केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि त्याग, तप, सेवा, समता और रामनाम की अखण्ड साधना का जीवंत प्रतीक है।
गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रस्तुत यह ऐतिहासिक तथ्य पहली बार व्यापक जनमानस के समक्ष आ रहा है कि रामनिवास धाम शाहपुरा की गौरवशाली आचार्य परम्परा में भीलवाड़ा जिले की पावन धरती से तीन संतों ने प्रधान पीठ पर आचार्य पद को सुशोभित किया। यह केवल भीलवाड़ा ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण रामस्नेही समाज के लिए गर्व का विषय है।

रामानंद परम्परा से रामस्नेह तक की दिव्य यात्रा-000
रामस्नेही संप्रदाय की आध्यात्मिक जड़ें संत शिरोमणि स्वामी रामानंदाचार्य की परम्परा से जुड़ी हुई हैं। संत रामानंद के बारह प्रमुख शिष्यों में संत अनंतानंद हुए। उनके शिष्य कृष्णदासजी ने जयपुर के गलता तीर्थ में कठोर तपस्या कर भक्ति की नई चेतना जगाई। इसके पश्चात संतदास और फिर कृपारामजी महाराज ने इस साधना परम्परा को आगे बढ़ाया।
इसी गुरु-शिष्य परम्परा की दसवीं पीढ़ी में अवतरित हुए आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज, जिन्होंने विक्रम और इतिहास के एक महत्वपूर्ण कालखंड में वर्ष 1760 में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना की। उन्होंने रामनाम को ही परमब्रह्म स्वीकार करते हुए निर्गुण-निराकार उपासना, सेवा, समता, वैराग्य और सरल जीवन का ऐसा संदेश दिया, जिसने समाज को नई आध्यात्मिक दिशा प्रदान की।
शाहपुरा बना रामनाम की राजधानी-000
सन 1769 में तत्कालीन शाहपुरा राजपरिवार के आमंत्रण पर स्वामी रामचरणजी महाराज शाहपुरा पधारे। यहीं स्थापित हुई रामनिवास धाम, जो कालांतर में सम्पूर्ण रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ बनी। तब से लेकर आज तक शाहपुरा विश्वभर के रामस्नेहियों की सर्वोच्च आस्था का केंद्र बना हुआ है। रामचरणजी महाराज के दिव्य व्यक्तित्व और रामनाम की अलौकिक साधना का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि अल्पकाल में ही देशभर में रामस्नेही संप्रदाय का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। जब अप्रैल 1798 में वे ब्रह्मलीन हुए, तब तक भारतवर्ष में लगभग 1600 रामद्वारे स्थापित हो चुके थे और लगभग 250 संत रामनाम की अलख जगा रहे थे। उस युग में किसी भी संत परम्परा के लिए यह असाधारण उपलब्धि थी।
वाणी बनी संप्रदाय का अमर ग्रंथ-000
महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के दिव्य अनुभवों, उपदेशों और आध्यात्मिक संदेशों को उनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किया। यही वाणी आज भी रामस्नेही संप्रदाय का प्रमुख एवं सर्वमान्य ग्रंथ है। इस वाणी का मूल संदेश है। रामनाम ही साधना है, रामनाम ही मुक्ति का पथ है, और गुरु ही उस मार्ग के प्रकाश स्तंभ हैं। संप्रदाय में मूर्तिपूजा की अपेक्षा निर्गुण-निराकार राम की साधना को महत्व दिया गया। साधना में सादगी, जीवन में सेवा और व्यवहार में समता। यही रामस्नेही दर्शन की आत्मा है।
चार धाम, एक आस्था-000
रामस्नेही परम्परा में शाहपुरा के अतिरिक्त सोड़ा, कुहाड़ा (भीलवाड़ा) और बनवाड़ा को प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना गया है। इन स्थलों से आज भी रामनाम की वही अखण्ड ध्वनि सुनाई देती है, जिसने ढाई सौ वर्ष पूर्व जन-जन के जीवन को आलोकित किया था।
इतिहास का स्वर्णिम अध्याय-भीलवाड़ा के तीन संत बने आचार्य-000
रामनिवास धाम की आचार्य परम्परा का अध्ययन करने पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। वर्तमान पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी रामदयालजी महाराज बताते हैं कि प्रधान पीठ पर विराजित आचार्यों में भीलवाड़ा जिले के तीन संतों ने सर्वोच्च आचार्य पद को सुशोभित किया। इस तथ्य की पुष्टि संप्रदाय के इतिहासकार ब्रजेंद्र कुमार सिंघल द्वारा संपादित आचार्य परम्परा ग्रंथ से होती है। वहीं संप्रदाय के वरिष्ठ संत एवं चलते-फिरते विश्वकोष माने जाने वाले वरिष्ठ संतश्री गुरुमुखरामजी महाराज ने भी इस ऐतिहासिक जानकारी का प्रमाणीकरण किया है।


प्रथम उत्तराधिकारी-स्वामी रामजनजी महाराज-000
महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात संप्रदाय के प्रथम उत्तराधिकारी के रूप में स्वामी रामजनजी महाराज आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। उनका जन्म भीलवाड़ा जिले के सरसिया चारणान ग्राम में माहेश्वरी वैश्य समाज के लढ़ा गोत्र में हुआ था। भीलवाड़ा में स्वामी रामचरणजी महाराज के दर्शन कर उन्होंने मंत्रदीक्षा ग्रहण की और अपने तप, त्याग तथा आध्यात्मिक प्रतिभा के कारण सम्पूर्ण संत समाज की सर्वसम्मति से प्रधान पीठ के आचार्य बने। लगभग बारह वर्षों तक उन्होंने संप्रदाय को सुदृढ़ नेतृत्व प्रदान किया।


छठे आचार्य-स्वामी हरिदासजी महाराज-000
रामस्नेही इतिहास में छठे आचार्य स्वामी हरिदासजी महाराज भी भीलवाड़ा जिले की पावन भूमि से जुड़े रहे। आगूचा ग्राम में दाधीच ब्राह्मण परिवार में जन्मे हरिदासजी महाराज ने बिशनिया में दीक्षा ग्रहण की। उनकी विद्वत्ता, साधना और मर्यादा के कारण उन्हें परम्परानुसार रामनिवास धाम की आचार्य पीठ पर प्रतिष्ठित किया गया। उनके कार्यकाल में संप्रदाय की अनुशासन परम्परा और अधिक सुदृढ़ हुई।

आठवें आचार्य-स्वामी दिलशुद्धरामजी महाराज-000
भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा क्षेत्र के सांगरिया के पास बागथला जिसे पूर्व में अभयपुर ग्राम से जाना जाता है, में जन्मे स्वामी दिलशुद्धरामजी महाराज रामस्नेही इतिहास के आठवें आचार्य बने। जब तत्कालीन आचार्य स्वामी हिम्मतरामजी महाराज ब्रह्मलीन हुए, तब संतों और भक्तों ने सर्वसम्मति से उन्हें प्रधान पीठ पर विराजमान किया। उनके नेतृत्व में रामनाम का प्रचार और संप्रदाय का विस्तार नई ऊँचाइयों तक पहुँचा।
विश्व पटल पर पहुंचा रामस्नेही संप्रदाय- 000
समय के साथ रामनिवास धाम की आचार्य परम्परा निरंतर आगे बढ़ती रही। विशेष रूप से चैदहवें आचार्य स्वामी रामकिशोरजी महाराज के काल में रामस्नेही संप्रदाय की पहचान राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँची। आज भारत सहित अनेक देशों में रामस्नेही अनुयायी रामनाम की इस अखण्ड परम्परा से जुड़े हुए हैं।
वर्तमान में पंद्रहवें आचार्य जगतगुरु स्वामी रामदयालजी महाराज रामनिवास धाम की पीठ पर विराजमान हैं। उनके आध्यात्मिक नेतृत्व में संप्रदाय सेवा, साधना, संस्कार और सामाजिक समरसता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। इस वर्ष उनका चातुर्मास भीलवाड़ा में आयोजित होना भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व का विषय है।


गुरु परम्परा का अमर संदेश-000
गुरुपूर्णिमा का पर्व हमें केवल गुरु वंदना का अवसर नहीं देता, बल्कि यह स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक परम्पराएँ केवल इतिहास नहीं होतीं। वे जीवंत संस्कृतियाँ होती हैं। रामनिवास धाम की आचार्य परम्परा इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। शाहपुरा की इस तपोभूमि से निकली रामनाम की अमर ज्योति आज भी विश्वभर के लाखों श्रद्धालुओं के जीवन को आलोकित कर रही है। और इतिहास का यह स्वर्णिम तथ्य कि भीलवाड़ा की धरती ने प्रधान पीठ को तीन-तीन आचार्य दिए, गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर रामस्नेही समाज के गौरव को नई ऊँचाई प्रदान करता है। रामनाम की यह परम्परा केवल एक संप्रदाय की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय संत परम्परा की अमूल्य आध्यात्मिक विरासत है, जिसका धु्रवतारा सदैव शाहपुरा का रामनिवास धाम ही रहेगा।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!