
भीलवाड़ा। धर्मनगरी भीलवाड़ा में शनिवार को स्वाधीनता दिवस का पर्व आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर नजर आया। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मेन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से पहली बार भीलवाड़ा में चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में ज्ञान गंगा महोत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। 30 अगस्त तक चलने वाले इस महोत्सव का आगाज राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जश्ने आजादी’ के रूप में हुआ।
नगर निगम के चित्रकूटधाम में करीब तीन घंटे चले इस आयोजन में आध्यात्मिकता और राष्ट्रभक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। विशाल पांडाल तिरंगे के रंगों में सजा था और देशभक्ति के नारों से वातावरण गूंजता रहा। पहले ही दिन हजारों श्रद्धालुओं ने पहुंचकर संतवाणी और राष्ट्रभक्ति के संदेशों की ज्ञान गंगा में आस्था की डुबकी लगाई।

‘मैं जैन संत हूं, लेकिन वतन की बात आए तो हिन्दुस्तानी हूं’
राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज ने अपने ओजस्वी और प्रेरणादायी उद्बोधन से उपस्थित जनसमूह को राष्ट्रगौरव का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “मैं जैन संत हूं, लेकिन जब वतन की बात आती है तो न जैन हूं, न संत—केवल हिन्दुस्तानी हूं।” उन्होंने कहा कि आज वे संत के रूप में नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान के बेटे के रूप में राष्ट्र की बात कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया घूमने के बाद भी अनेकता में एकता, विविधता में समरसता और सांस्कृतिक वैभव का जो स्वरूप भारत में दिखाई देता है, वैसा कहीं और नहीं मिलता। भारत केवल नक्शे पर बनी भूमि नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और त्याग की धरती है। इसे महान बनाने की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है।

नाम, भाषा और संस्कृति पर गर्व जरूरी
आचार्य पुलकसागर महाराज ने स्वतंत्रता के 80वें वर्ष के अवसर पर देशवासियों के सामने तीन आत्ममंथन के प्रश्न रखे—हम अपने देश को किस नाम से पुकारते हैं, हमारी भाषा क्या है और हमारी सभ्यता-संस्कृति एवं परिधान को लेकर हमारी सोच क्या है?
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसके इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है। उन्होंने ‘इंडिया’ और ‘भारत’ नाम को लेकर अपने विचार रखते हुए कहा कि हमें अपनी प्राचीन पहचान और गौरव पर गर्व करना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि भारत शब्द को गर्व और आत्मसम्मान के साथ अपनाएं।

भाषा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि देश में मराठी, गुजराती, तमिल, बंगाली सहित अनेक भाषाएं हैं और सभी भारतीय भाषाएं हमारी माताओं के समान हैं। हिंदी इन भाषाओं के बीच संवाद और आत्मीयता का माध्यम बनती है। उन्होंने हिंदी के सम्मान और उसके व्यापक उपयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि अंग्रेजी वैश्विक संपर्क और व्यापार की भाषा हो सकती है, लेकिन अपनी मातृभाषाओं के प्रति सम्मान हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
संस्कृति को उत्सवों में भी जीवित रखना होगा
आचार्यश्री ने कहा कि जिस समाज को अपनी भाषा, संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज और परंपराओं पर गर्व नहीं होता, वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर हो जाता है। उन्होंने युवाओं से भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूती से संभालना होगा तथा रामनवमी, रक्षाबंधन, दीपावली, महावीर जयंती जैसे पर्वों के मूल भाव को समझते हुए उन्हें उत्साह से मनाना चाहिए।
‘भारत माता’ के प्रति गौरव का संदेश
भारत भूमि को नमन करते हुए पुलकसागर महाराज ने कहा कि दुनिया में अनेक राष्ट्र हैं, लेकिन भारत को ही भावनात्मक रूप से ‘माता’ कहकर पुकारा जाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की ओर दुनिया आकर्षित होती रही है। भारत का इतिहास, स्वाभिमान और विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
उन्होंने कहा कि देश की कमियां गिनाने के बजाय उसे बेहतर बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। जब नागरिक स्वयं बदलने का संकल्प लेते हैं तो समाज और राष्ट्र में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है।
कश्मीर को लेकर भी बोले आचार्य
आचार्य पुलकसागर महाराज ने जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की अखंडता और राष्ट्रीय स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत अब आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा और स्वाभिमान को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि भारत की पहचान शांति, सह-अस्तित्व और आत्मसम्मान की रही है।
दस समूहों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां
जश्ने आजादी के दौरान दस समूहों ने राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। देशभक्ति के गीतों, प्रस्तुतियों और भावपूर्ण अभिनय से पूरा पांडाल तालियों और ‘भारत माता की जय’ तथा ‘जय हिंद’ के उद्घोष से गूंज उठा। प्रस्तुतियों में राष्ट्रप्रेम का ऐसा भाव दिखाई दिया कि निर्णायकों के लिए विजेताओं का चयन भी चुनौतीपूर्ण हो गया।
प्रतियोगिता में संभव ग्रुप ने प्रथम, भारत की बेटियां ग्रुप ने द्वितीय तथा आजादी की वीरांगना ग्रुप ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। विजेता समूहों को चातुर्मास समिति की ओर से नगद पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत ध्वजारोहण से हुई। सांसद दामोदर अग्रवाल ने ध्वजारोहण किया। आचार्यश्री का पाद प्रक्षालन एवं श्रीफल समर्पित कर भाजपा जिलाध्यक्ष प्रशांत मेवाड़ा एवं पूर्व विधायक विट्ठलशंकर अवस्थी ने अभिनंदन किया। चातुर्मास समिति अध्यक्ष प्रवीण चौधरी, संयोजक मनीष शाह, सह संयोजक लोकेश अजमेरा सहित पदाधिकारियों ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन समिति महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।
उप मुख्यमंत्री बैरवा ने लिया आशीर्वाद
शनिवार दोपहर राजस्थान के उप मुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने सूर्यमहल पहुंचकर विराजित राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज के दर्शन किए और आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान उन्होंने आचार्यश्री से विभिन्न विषयों पर धर्म एवं सामाजिक सरोकारों को लेकर चर्चा भी की। चातुर्मास समिति के पदाधिकारियों ने उप मुख्यमंत्री का स्वागत एवं सम्मान किया।
ज्ञान गंगा महोत्सव के तहत प्रतिदिन सुबह 8.30 से 10 बजे तक चित्रकूटधाम में कार्यक्रम होंगे। 19 अगस्त को मोक्ष सप्तमी तथा 28 अगस्त को रक्षाबंधन के अवसर पर विशेष आयोजन होंगे। स्वतंत्रता दिवस पर शुरू हुआ यह महोत्सव अब भीलवाड़ा में धर्म, ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्रचेतना के संगम का संदेश देने के लिए आगे बढ़ेगा।



