
संपादकीय | रिश्तों का यह कैसा दौर…?
वर्तमान वैश्विक दौर में इससे अधिक पीड़ादायक और चिंताजनक दृश्य शायद ही कोई हो सकता है।
जिस पिता ने अपना पूरा जीवन अपनी तीनों बेटियों के पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और उन्हें समाज में सम्मानजनक मुकाम दिलाने में समर्पित कर दिया, उसी पिता की अंतिम यात्रा में बेटियां प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हो सकीं। उन्हें अपने पिता के अंतिम संस्कार का दृश्य केवल एक मोबाइल स्क्रीन पर देखना पड़ा। मुखाग्नि देने का दायित्व भी लोगों को निभाना पड़ा।
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों का आईना है।
हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ माता-पिता को देवतुल्य माना गया है, जहाँ संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार है और जहाँ अंतिम विदाई को संतान का सर्वोच्च कर्तव्य समझा जाता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आधुनिक जीवन की भागदौड़, भौगोलिक दूरियां और व्यावसायिक व्यस्तताएं हमारे रिश्तों से भी बड़ी हो गई हैं?
यह किसी व्यक्ति या परिवार पर निर्णय सुनाने का समय नहीं है, क्योंकि हर घटना की अपनी परिस्थितियां होती हैं। लेकिन इतना अवश्य है कि इस घटना ने समाज के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या हम अपने जीवन की प्राथमिकताओं में कहीं अपने सबसे बड़े रिश्ते को पीछे तो नहीं छोड़ रहे?
धन, सफलता और उपलब्धियां जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, लेकिन माता-पिता के अंतिम क्षणों में उनकी उपस्थिति का स्थान कोई तकनीक, कोई वीडियो कॉल और कोई वर्चुअल माध्यम नहीं ले सकता।
वरिष्ठ पत्रकार रोशनजी ने इस संवेदनशील विषय को समाज के सामने रखकर केवल एक समाचार नहीं दिया, बल्कि हर परिवार को आत्ममंथन करने का अवसर दिया है। इसके लिए वे बधाई और साधुवाद के पात्र हैं।
आइए, सफलता की दौड़ में इतना आगे न निकल जाएं कि पीछे मुड़कर देखने पर अपने ही रिश्ते धुंधले दिखाई दें।
आपकी क्या राय है? क्या बदलते समय में रिश्तों की संवेदनाएं कमजोर हो रही हैं, या परिस्थितियों को समझना भी उतना ही आवश्यक है?




