रामधुनी से गूंजा भीलवाड़ा, जगद्गुरु आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज के सानिध्य में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास का शुभारंभ
आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर हुई चातुर्मासिक स्थापना, आचार्यश्री बोले— ‘जिसके हृदय में राम हैं, उसके जीवन में चिंता नहीं, केवल परम आनंद है’

मूलचन्द पेसवानी
भीलवाड़ा, 25 जुलाई। आषाढ़ शुक्ल एकादशी का पुण्य पर्व शनिवार को भीलवाड़ा में आध्यात्मिक उल्लास, भक्ति और वैदिक परंपराओं के दिव्य वातावरण के बीच मनाया गया। अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय, शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज के पावन सानिध्य में ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास का विधिवत शुभारंभ हुआ। रामधुनी, वाणीजी के पाठ, आरती, पूजन और संतवाणी से पूरा वातावरण राममय हो उठा तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक आयोजन में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया।
प्रातःकाल रामधुनी और मंगल आरती के साथ चातुर्मासिक स्थापना सम्पन्न हुई। इसके पश्चात आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने अपने अमृतमय प्रवचनों में चातुर्मास के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के संविधान और सनातन परंपरा के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना, भक्ति, संयम और लोककल्याण का महापर्व है।
उन्होंने इस अवसर को सम्प्रदाय के लिए “आल्हादित करने वाला स्वर्णिम पल” बताते हुए कहा कि चातुर्मास प्रारंभ होने के साथ ही वाणीजी के नियमित पाठ का भी शुभारंभ हो गया है। अब प्रतिदिन एक विधान का पाठ किया जाएगा, जिससे श्रद्धालु संतवाणी के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन मूल्यों को आत्मसात कर सकेंगे।

स्वामी रामचरणजी महाराज की तपोभूमि है भीलवाड़ा
अपने प्रवचन में आचार्यश्री ने रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी रामचरणजी महाराज सहित अनेक महान संतों का स्मरण करते हुए कहा कि सम्प्रदाय की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संत परंपरा और भजनीक संतों की साधना रही है। आज भी संतों की वाणी और भजन श्रद्धालुओं को रामस्नेही संस्कारों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने भीलवाड़ा की धार्मिक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भूमि अत्यंत पावन है, क्योंकि सन 1817 में स्वामी रामचरणजी महाराज के चरण यहां पड़े थे। उन्होंने मियाचंदजी तोषनीवाल की बावड़ी पर बैठकर लंबे समय तक भजन-सत्संग किया था। उसी तप, भक्ति और साधना की ऊर्जा आज भी इस भूमि के कण-कण में विद्यमान है।
स्वरूपाबाई की साधना का किया स्मरण
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने रामस्नेही सम्प्रदाय की महान साधिका स्वरूपाबाई का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन नारी शक्ति, भक्ति और आध्यात्मिक समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि मेवाड़ की मीराबाई जिस प्रकार भक्ति की अमर प्रतीक हैं, उसी प्रकार रामस्नेही सम्प्रदाय में नवलरामजी की पुत्री स्वरूपाबाई की साधना का इतिहास भीलवाड़ा की धरती पर आज भी गूंज रहा है।
उन्होंने कहा कि स्वरूपाबाई की तपस्या और स्वामी रामचरणजी महाराज की साधना का ही प्रभाव है कि आज सम्प्रदाय निरंतर विकसित हो रहा है और देश-विदेश में रामभक्ति का संदेश पहुंचा रहा है।

‘पुत्र-पुत्री में भेद करना अज्ञान’
आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में समाज को महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि पुत्र और पुत्री में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह धारणा कि केवल पुत्र से ही परिवार का नाम चलता है, पूर्णतः अज्ञानजन्य है।
उन्होंने भावुक शब्दों में कहा कि बेटियां भी परिवार, समाज और राष्ट्र का गौरव बढ़ाती हैं। संसार का शायद ही कोई ऐसा पिता होगा जिसकी आंखें बेटी की विदाई के समय नम न हुई हों। इसलिए बेटियों को समान सम्मान, अवसर और संस्कार देना प्रत्येक परिवार का कर्तव्य है।
‘राम हृदय में हों तो चिंता स्वतः समाप्त हो जाती है’
आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन का सार बताते हुए कहा कि परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक जीव उसी की सत्ता पर आधारित है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर का दिव्य प्रकाश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने की है। जिस व्यक्ति के हृदय में राम का निवास होता है, उसके जीवन से भय, चिंता और असुरक्षा स्वतः समाप्त हो जाती है तथा उसका जीवन परम आनंद और आत्मिक शांति से भर जाता है।
संतों के प्रवचन और भजनों से सराबोर हुआ वातावरण
मुख्य प्रवचन से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए रामभक्ति और संत परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं कोटा से पधारे संत प्रीतमरामजी ने मधुर भजनों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। उनके भजनों पर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर होकर रामनाम का संकीर्तन करते रहे।
प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने विधिवत आरती कर जगद्गुरु आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया। पूरे परिसर में रामधुन, भजन और जयघोषों की गूंज देर तक बनी रही।
प्रतिदिन होगा सत्संग और वाणीजी का पाठ
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से 9:00 बजे तक वाणीजी का पाठ तथा सुबह 9:00 बजे से 10:00 बजे तक दैनिक सत्संग एवं प्रवचन आयोजित किए जाएंगे। वहीं प्रतिदिन सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामधुनी में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त करेंगे।
भीलवाड़ा सहित आसपास के अनेक नगरों और गांवों से पहुंचे श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आध्यात्मिक आयोजन को और अधिक भव्य बना दिया। रामनाम की गूंज, संतवाणी की मधुरता और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के बीच प्रारंभ हुआ ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास आगामी चार महीनों तक आध्यात्मिक साधना, सामाजिक जागरण और मानव कल्याण का संदेश देता रहेगा।




