
शाहपुरा संवाद | मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा। शाहपुरा जिला बहाली का आंदोलन अब केवल सड़कों, धरनों और सभाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है। करीब डेढ़ साल से चल रही जिला बहाली की मुहिम ने अब सीधी राजनीतिक करवट ले ली है। शाहपुरा जिला बहाली संघर्ष समिति ने आगामी निकाय चुनाव में नगर पालिका के सभी 35 वार्डों से अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है।
यानी अब संघर्ष समिति का अगला मोर्चा आंदोलन स्थल नहीं, बल्कि चुनावी मैदान होगा।

समिति के इस ऐलान ने निकाय चुनाव की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। अभी तक जिला बहाली के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं से सवाल-जवाब होते रहे हैं, लेकिन अब संघर्ष समिति ने खुद चुनावी मैदान में उतरने का फैसला कर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
सियासी गलियारों में इस घोषणा को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि शाहपुरा नगरपालिका में कुल 35 वार्ड हैं और समिति का लक्ष्य किसी एक-दो वार्ड तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे शहर में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने का है।

आंदोलन से चुनाव तक… अब वोट की चोट की तैयारी
जिला बहाली की मांग को लेकर पिछले करीब 18 महीने से आंदोलन चल रहा है। समिति का आरोप है कि कांग्रेस सरकार द्वारा गठित शाहपुरा जिले को भाजपा सरकार ने अन्यायपूर्ण तरीके से भंग कर दिया। जिला समाप्त होने के बाद से ही शाहपुरा में विरोध और बहाली की मांग को लेकर विभिन्न स्तरों पर आंदोलन जारी है।
संघर्ष समिति के संयोजक रामप्रसाद जाट और अध्यक्ष एडवोकेट दुर्गालाल राजोरा का कहना है कि लंबे समय से आंदोलन के बावजूद सरकार की ओर से जिला बहाली को लेकर कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई। ऐसे में अब संघर्ष समिति ने आंदोलन को नई दिशा देने का निर्णय लिया है।
यही वजह है कि आगामी निकाय चुनाव में सभी 35 वार्डों में प्रत्याशी उतारने की तैयारी शुरू कर दी गई है।
सीधा संदेश यह है कि अब जिला बहाली का मुद्दा सिर्फ ज्ञापन और धरने में नहीं, बल्कि मतपेटी तक पहुंचाने की तैयारी है।
चुनावी कार्यालय खुला, मैदान सजने लगा
शुक्रवार दोपहर संघर्ष समिति ने अपने चुनावी अभियान की दिशा में पहला कदम भी बढ़ा दिया। शाहपुरा अभिभाषक संस्था के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिलोकचंद नौलखा की मौजूदगी में संघर्ष समिति के चुनाव कार्यालय का शुभारंभ किया गया।
कार्यालय शुरू होते ही यह साफ संकेत मिल गया कि समिति का ऐलान महज बयान नहीं है। संगठन अब चुनावी तैयारी को जमीन पर उतारने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
समिति से जुड़े पदाधिकारी और कार्यकर्ता संभावित उम्मीदवारों, वार्डवार रणनीति और चुनावी अभियान को लेकर तैयारी में जुटने की बात कह रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 35 वार्डों में समिति किस चेहरे को मैदान में उतारती है और क्या जिला बहाली का मुद्दा मतदाताओं को राजनीतिक विकल्प के रूप में आकर्षित कर पाएगा?
यही चुनाव के दौरान सबसे दिलचस्प सवालों में से एक रहने वाला है।
भाजपा-कांग्रेस के सामने तीसरा राजनीतिक मोर्चा?
शाहपुरा की स्थानीय राजनीति में अब तक मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जाता रहा है। लेकिन संघर्ष समिति की घोषणा के बाद चुनावी समीकरणों में एक नया कोण जुड़ गया है।
समिति किसी राजनीतिक दल के बैनर तले चुनाव लड़ने के बजाय जिला बहाली के मुद्दे को केंद्र में रखकर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है।
इससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपने-अपने स्तर पर सवाल खड़े होंगे। समिति यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि यदि सरकार जिला बहाली के मुद्दे पर जनता की आवाज नहीं सुनती तो अब जनता के बीच जाकर उसी मुद्दे पर वोट मांगे जाएंगे।
राजनीति में इसे ‘आंदोलन से चुनावी जवाब’ की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि चुनाव में इसका कितना असर होगा, यह तो परिणाम बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि समिति के मैदान में उतरने से चुनावी बहस में जिला बहाली का मुद्दा और ज्यादा प्रमुख हो सकता है।
शाहपुरा के हित में स्वैच्छिक बंद की अपील
समिति ने आंदोलन के अगले चरण के रूप में 31 अगस्त को शाहपुरा बंद का आह्वान भी किया है। संयोजक रामप्रसाद जाट और अध्यक्ष दुर्गालाल राजोरा ने आम नागरिकों और व्यापारियों से स्वैच्छिक रूप से बंद में सहयोग करने की अपील की है।
समिति का कहना है कि बंद के माध्यम से सरकार तक शाहपुरा की मांग को मजबूती से पहुंचाया जाएगा।
बंद के साथ ही आमसभा का आयोजन भी किया जाएगा। इसमें जिला बहाली आंदोलन को आगे किस रणनीति के साथ बढ़ाया जाए, इस पर चर्चा की जाएगी। समिति ने आम नागरिकों से अधिक से अधिक संख्या में आमसभा में पहुंचने की अपील की है।
अब नारा नहीं, चुनावी फैसला!
संघर्ष समिति के इस कदम ने शाहपुरा की चुनावी राजनीति को एक नया मुद्दा दे दिया है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं रहेगा कि शाहपुरा जिला बहाल होगा या नहीं।
सवाल यह भी होगा कि क्या जिला बहाली के मुद्दे पर संघर्ष समिति के उम्मीदवार जनता का राजनीतिक समर्थन हासिल कर पाएंगे?
35 वार्डों में उम्मीदवार उतारने का ऐलान बड़ा है, लेकिन असली परीक्षा टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार और मतदान तक होगी।
कौन-कौन से चेहरे सामने आते हैं, किन वार्डों में मजबूत दावेदार उतरते हैं, भाजपा और कांग्रेस की रणनीति क्या रहती है और जनता किस मुद्दे को प्राथमिकता देती है—इन सब पर अब शाहपुरा की निगाहें रहेंगी।
फिलहाल संघर्ष समिति ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि जिला बहाली की लड़ाई अब आंदोलन के साथ-साथ चुनावी राजनीति के मैदान में भी लड़ी जाएगी।
📢 31 अगस्त को शाहपुरा बंद का आह्वान
जिला बहाली संघर्ष समिति ने 31 अगस्त को स्वैच्छिक शाहपुरा बंद का आह्वान किया है। समिति ने व्यापारियों और आम नागरिकों से बंद में सहयोग करने तथा इसके बाद आयोजित आमसभा में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की है।
आमसभा में जिला बहाली आंदोलन की आगामी रणनीति पर चर्चा होगी।
इस दौरान समिति के प्रवक्ता कमलेश मुंडेतिया, सूर्यप्रकाश ओझा, उदयलाल बैरवा, हाजी उस्मान छीपा, सत्यनारायण पाठक, प्रियांशु यदुवंशी, प्रेम शारदा, धनराज, छोटू नीलगर, अनिल दत्त पौंड्रिक, रमेश मालू, अंकित मालू, अभय गुर्जर, निखिल व्यास, अतुल पारीक, गोविंद घुसर, दुर्गालाल जोशी और राजू कायमखानी सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।




