प्रशासनिक उपेक्षा ने ढहाया जहाजपुर के गौरव का एक और अध्याय: नौ चौक की ऐतिहासिक कचहरी परिसर में गिरी रियासतकालीन छत, मलबे में दबी सदियों पुरानी धरोहर
आस्था, इतिहास और विरासत पर लापरवाही की मार; कचहरी के गणेशजी मंदिर से सटे भवन का कमरा भरभराकर गिरा, प्राचीन सामग्री नष्ट, लोगों में भारी आक्रोश

शाहपुरा संवाद |
जहाजपुर की ऐतिहासिक पहचान, मेवाड़ की गौरवशाली विरासत और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र माने जाने वाले नौ चौक स्थित ऐतिहासिक कचहरी परिसर में शुक्रवार शाम घटी एक दर्दनाक घटना ने प्रशासनिक लापरवाही की परतें उधेड़कर रख दीं। वर्षों से संरक्षण की बाट जोह रही रियासतकालीन इमारत का एक कमरा अचानक भरभराकर ढह गया। इस हादसे में कचहरी के गणेशजी मंदिर का बहुमूल्य और प्राचीन धार्मिक एवं ऐतिहासिक सामान मलबे में दबकर नष्ट हो गया। गनीमत रही कि घटना के समय कमरे में कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था, अन्यथा यह हादसा बड़ी जनहानि का कारण बन सकता था।
यह हादसा केवल एक जर्जर भवन के ढहने की घटना नहीं, बल्कि जहाजपुर के गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और प्रशासनिक संवेदनहीनता की एक दर्दनाक तस्वीर बनकर सामने आया है। स्थानीय नागरिकों, इतिहास प्रेमियों और श्रद्धालुओं का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर का संरक्षण किया जाता तो आज सदियों पुरानी अमूल्य विरासत मलबे में तब्दील नहीं होती।
जनसहयोग से मंदिर संवर गया, लेकिन प्रशासन ने धरोहर को नहीं संभाला
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार कुछ समय पूर्व ग्रामीणों और भक्तों ने जनसहयोग से कचहरी के गणेशजी मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मरम्मत कार्य के दौरान संबंधित विभाग ने मंदिर की प्राचीन मूर्तियाँ, पूजा सामग्री, ऐतिहासिक अभिलेख और अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ सुरक्षा के नाम पर समीप स्थित रियासतकालीन भवन के एक पुराने कमरे में रखवा दीं।
विडंबना यह रही कि जिस भवन में इन धरोहरों को रखा गया, वह स्वयं जर्जर अवस्था में था। स्थानीय लोगों ने कई बार इसकी मरम्मत और संरक्षण की मांग की, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अंततः शुक्रवार शाम भवन की छत भरभराकर गिर गई और सदियों पुरानी धरोहर मलबे में दब गई।
आस्था और इतिहास पर प्रशासनिक उदासीनता भारी
घटना के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक मौके पर पहुंचे। लोगों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि प्रशासन ने मंदिर का सामान तो अपने कब्जे में ले लिया, लेकिन उसकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की। यदि समय रहते भवन का संरक्षण किया जाता या सामग्री को सुरक्षित स्थान पर रखा जाता तो यह अपूरणीय क्षति टाली जा सकती थी।
जहाँ कभी न्याय की गूंज थी, वहाँ आज खंडहर की खामोशी
नौ चौक का यह ऐतिहासिक परिसर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि जहाजपुर के प्रशासनिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। रियासतकाल में यहीं कचहरी संचालित होती थी, जहाँ न्यायिक फैसले सुनाए जाते थे। इसके साथ ही उपजेल, तहसील कार्यालय और राजस्व विभाग सहित अनेक प्रमुख शासकीय कार्यालय इसी परिसर से संचालित होते थे।
नए प्रशासनिक भवन बनने के बाद सरकारी कार्यालयों का स्थानांतरण तो कर दिया गया, लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। वर्षों की उपेक्षा ने कभी भव्य रहे इस परिसर को खंडहर में बदल दिया और अब इसकी छतें भी जवाब देने लगी हैं।
इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है नौ चौक की पहचान
इतिहासकारों के अनुसार नौ चौक स्थित कचहरी का निर्माण मध्यकाल में मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया राजवंश के शासनकाल में हुआ था। यहाँ स्थापित गणेशजी की प्रतिमा प्रशासनिक कार्यों की सफलता, न्याय और शुभारंभ का प्रतीक मानी जाती थी।
महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.) ने सीमांत सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से जहाजपुर दुर्ग का पुनरुद्धार कराया तथा दुर्ग के नीचे प्रशासनिक चौकियों और राजकीय भवनों का विस्तार कराया। बाद में मुगल शासन और शाहपुरा रियासत के दौर से गुजरने के पश्चात पुनः मेवाड़ के अधीन आने पर यह परिसर राजस्व और न्यायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना, जहाँ कर वसूली, राजकीय बैठकें और प्रशासनिक निर्णय लिए जाते थे।
उपेक्षा पर उठ रहे सवाल, जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जहाजपुर जैसा ऐतिहासिक नगर, जहाँ सनातन धर्म के संरक्षण का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के विधायक जनप्रतिनिधि हैं, जहाँ उपखंड मुख्यालय और नगर पालिका मुख्यालय दोनों स्थित हैं, वहाँ इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर का संरक्षण नहीं हो सका। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब प्रशासनिक तंत्र, जनप्रतिनिधि और स्थानीय निकाय सभी यहीं मौजूद हैं, तब भी इस धरोहर की दुर्दशा समझ से परे है।
लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों ने गंभीरता दिखाई होती तो आज यह ऐतिहासिक भवन ढहता नहीं और न ही सदियों पुरानी धरोहर नष्ट होती। यह घटना जिम्मेदार विभागों और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
धरोहर संरक्षण की अनदेखी भविष्य के लिए खतरे की घंटी
इतिहास प्रेमियों का कहना है कि जहाजपुर का किला, प्राचीन मंदिर, बावड़ियाँ और नौ चौक परिसर जैसी अनेक धरोहरें लगातार उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। यदि समय रहते इनके संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल पुस्तकों में ही इस गौरवशाली इतिहास को पढ़ पाएंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरातात्विक महत्व के ऐसे भवनों का तकनीकी सर्वे कराकर तत्काल संरक्षण कार्य शुरू होना चाहिए। मलबे में दबी ऐतिहासिक सामग्री को विशेषज्ञों की निगरानी में सुरक्षित निकालकर संरक्षित किया जाना चाहिए तथा पूरे परिसर का वैज्ञानिक ढंग से पुनरुद्धार कराया जाना चाहिए।
जनता की मांग— अब और नहीं, धरोहर बचाओ
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और इतिहास प्रेमियों ने प्रशासन से मांग की है कि नौ चौक परिसर को तत्काल संरक्षित धरोहर घोषित कर इसके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की व्यापक कार्ययोजना बनाई जाए। साथ ही इस हादसे की जिम्मेदारी तय कर लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
शुक्रवार शाम गिरी वह छत केवल पत्थरों का ढेर नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता, सांस्कृतिक असंवेदनशीलता और विरासत संरक्षण की विफलता का प्रतीक बन गई। यह घटना एक चेतावनी भी है कि यदि आज भी जिम्मेदार नहीं चेते, तो जहाजपुर की ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे मलबे में दफन होती चली जाएगी और आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह पूछती रह जाएँगी कि इतिहास बचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?




