“सिर्फ जन्म से नहीं, संस्कारों से बनता है सच्चा सनातनी” — शिव महापुराण कथा में गूंजा संस्कृति संरक्षण का संदेश
पूज्य गजेन्द्र गोपाल शास्त्री बोले— तीज-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परिवार की आत्मा हैं; नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने का किया आह्वान

“संस्कार बचेंगे तो संस्कृति बचेगी, संस्कृति बचेगी तो सनातन की पहचान अमर रहेगी।”
शाहपुरा। माहेश्वरी पंचायत भवन, सदर बाजार में आयोजित नौ दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के पावन वातावरण में गुरुवार को श्रद्धा, भक्ति और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास पूज्य श्री गजेन्द्र गोपाल जी शास्त्री ने अपने ओजस्वी और प्रेरक प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सनातन धर्म की मूल भावना, भारतीय संस्कृति की गरिमा और पारिवारिक संस्कारों के महत्व से अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “केवल हिंदू परिवार में जन्म लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने जीवन में सनातन धर्म के संस्कार, आचरण और परंपराओं को अपनाना ही सच्चे सनातनी की पहचान है।”
कथा के दौरान श्रद्धालुओं से खचाखच भरे पंडाल में शास्त्रीजी ने कहा कि आज का समय अपनी जड़ों से जुड़ने का है। यदि हमारी नई पीढ़ी तीज-त्योहारों, धार्मिक संस्कारों और पारंपरिक जीवन मूल्यों से दूर होती चली गई तो हमारी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि आधुनिकता को अपनाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं को छोड़ देना भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

‘पर्व केवल उत्सव नहीं, जीवन जीने की कला हैं’
पूज्य शास्त्रीजी ने कहा कि दीपावली, होली, गणगौर, जन्मोत्सव, व्रत एवं पर्व केवल आनंद और उत्सव मनाने के अवसर नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और पारिवारिक एकता के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि एक समय था जब पूरा समाज इन पर्वों को सामूहिक रूप से उत्साह, श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाता था। इन आयोजनों से परिवारों में आत्मीयता बढ़ती थी, समाज में भाईचारा मजबूत होता था और नई पीढ़ी को सहज रूप से संस्कारों की शिक्षा मिलती थी।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने घरों में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को पुनः जीवंत करें तथा बच्चों को तीज-त्योहारों के वास्तविक महत्व से परिचित कराएं। उनका कहना था कि यदि परिवार ही अपने संस्कारों की रक्षा करेगा तो समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान स्वतः सुरक्षित रहेगी।
हर पर्व के पीछे छिपा है आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संदेश
कथाव्यास ने विशेष रूप से गणगौर, होली सहित सनातन धर्म के विभिन्न पर्वों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में कोई भी पर्व या व्रत बिना उद्देश्य के नहीं बनाया गया। प्रत्येक पर्व के पीछे गहरा आध्यात्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक आधार छिपा हुआ है, जो मनुष्य को प्रकृति, समाज और ईश्वर से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में जन्मोत्सव, नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और अन्य संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि जीवन को अनुशासित, मर्यादित और मूल्यवान बनाने की प्रक्रिया हैं। इन संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना प्रत्येक परिवार की जिम्मेदारी है।
भगवान के अवतार देते हैं आदर्श जीवन का संदेश
प्रवचन के दौरान पूज्य श्री गजेन्द्र गोपाल शास्त्री ने भगवान के विभिन्न अवतारों का उल्लेख करते हुए कहा कि परशुराम जयंती, वामन जयंती, नरसिंह जयंती सहित सनातन धर्म के प्रत्येक पर्व और व्रत का विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि हमारे ऋषि-मुनियों ने तिथि, वार, नक्षत्र और ऋतु के अनुरूप पर्व एवं व्रतों की परंपरा स्थापित की, जिससे मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मसंयम, अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार केवल धार्मिक कथाओं के पात्र नहीं हैं, बल्कि वे मानव जीवन के आदर्श हैं। उनके जीवन से धर्म, कर्तव्य, त्याग, मर्यादा, साहस, सेवा और लोककल्याण की प्रेरणा मिलती है। सनातन धर्म का प्रत्येक व्रत और पर्व मनुष्य को अपने भीतर झांकने, आत्मचिंतन करने और श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
श्रद्धालुओं ने लिया संस्कृति संरक्षण का संकल्प
कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने शिव महापुराण का रसपान किया और धर्म, संस्कृति तथा पारिवारिक संस्कारों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। पूरे पंडाल में “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा के माध्यम से मिले संदेशों को वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि समाज में संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत बनाने के लिए ऐसे धार्मिक आयोजनों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
नौ दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के माध्यम से प्रतिदिन श्रद्धालुओं को धर्म, अध्यात्म और जीवन मूल्यों की प्रेरणा मिल रही है। कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से परिचित कराने का सशक्त माध्यम बनती जा रही है।




