नेत्रदान से किसी की अंधेरी दुनिया में लौट सकती है रोशनी | आचार्य रामदयालजी ने कहा—देह राख बनने से बेहतर किसी जरूरतमंद के काम आए | नेत्रदान जागरूकता अभियान के पोस्टर-बैनर का विमोचन, श्रद्धालुओं ने भरे संकल्प पत्र
भीलवाड़ा, मूलचन्द पेसवानी।
जैसी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि दिखाई देगी। आंखें केवल दुनिया देखने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को देखने और समझने की खिड़की हैं। जिस आंखों से हम जीवनभर इस संसार को देखते हैं, वही आंखें अंतिम समय किसी ऐसे व्यक्ति को दे दी जाएं, जिसे इस दुनिया को देखने की जरूरत है, तो इससे बड़ा जीवन का सार्थक उपयोग क्या हो सकता है।
“जब यहां से जाने का वक्त आए तो दुनिया बनाने वाले को देखने जाना, उस समय अपनी आंखें उन लोगों के लिए छोड़ जाना, जिन्हें इस जगत को देखने की जरूरत है।” यह भावपूर्ण संदेश अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने मंगलवार को भीलवाड़ा में चल रहे ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के तहत दैनिक सत्संग में नेत्रदान के महत्व पर चर्चा करते हुए दिया।
आचार्यश्री ने कहा कि कोई व्यक्ति मरते-मरते भी नेत्रदान कर जाए तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है। देहदान और नेत्रदान सेवा के ऐसे पुनीत कार्य हैं, जिनका पुण्य कई गुना होकर वापस मिलता है। मृत्यु के बाद शरीर राख में बदल जाना है, लेकिन यदि यही शरीर अथवा इसकी आंखें किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी ला दें तो इससे बड़ी मानव सेवा नहीं हो सकती।

“आंखें छोड़ जाओ, किसी की दुनिया रोशन हो जाएगी”
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि नेत्रदान करने वालों को परमात्मा के दिव्य चक्षु प्राप्त होते हैं। हमारे महापुरुषों ने भी त्याग और सेवा का संदेश दिया है। जिस व्यक्ति को नेत्रदान से दृष्टि प्राप्त होती है, वह जीवनभर उस अज्ञात दाता के प्रति अहोभाव रखता है, जिसने दुनिया देखने का अवसर दिया।
उन्होंने कहा कि जीवन का मूल्य केवल इस बात में नहीं है कि हमने अपने लिए कितना कमाया, बल्कि इस बात में है कि जाते-जाते हम किसी के कितने काम आए। धन-संपत्ति पीछे रह जाती है, लेकिन सेवा और परोपकार के संस्कार समाज में लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
आचार्यश्री ने नेत्रदान को किसी एक अभियान या पखवाड़े तक सीमित रखने के बजाय इसे जीवनभर की सेवा भावना बनाने का आह्वान किया।
अंतिम समय राम नाम रहे, तो जीवन का उद्धार
सत्संग में आचार्यश्री ने मृत्यु और अंतिम समय के भावों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब मृत्यु का समय आए तो मुख से केवल राम का नाम निकलता रहे तो आत्मा परमात्मा में विलीन होने की दिशा में आगे बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस भाव के साथ देह त्यागता है, उसी के अनुरूप उसकी गति निर्धारित होती है। यदि अंतिम समय में मन मकान, धन, संपत्ति या सांसारिक सुखों में उलझा रहेगा तो उसकी आध्यात्मिक यात्रा प्रभावित होती है। इसलिए जीवनभर ऐसा अभ्यास करना चाहिए कि अंतिम समय में परमात्मा के अलावा किसी अन्य का चिंतन न रहे।
“मरते समय राम नाम लेना और सुनना जीवन के उद्धार का मार्ग बन सकता है।” उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन में राम नाम और सद्कर्मों को अपनाने की प्रेरणा दी।
आंखें बंद करने से हालात नहीं बदलते
आचार्य रामदयालजी महाराज ने मनुष्य के अहंकार और अज्ञान पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि हम किसी को कुछ भी कह दें, लेकिन जब सामने वाला उसी भाषा में जवाब देता है तो हमारे अहंकार को चोट पहुंचती है। इसलिए जीवन में अपने व्यवहार को देखने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि आंखें बंद कर लेने से हालात नहीं बदल जाते। यह मान लेना कि मेरे अलावा कोई कुछ नहीं जानता, अभिमान और अज्ञान का प्रतीक है। व्यक्ति को बाहरी आंखों के साथ अपने भीतर की आंखें भी खोलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब अंतर चक्षु खुलेंगे तो मनुष्य को स्वयं दिखाई देने लगेगा कि वह क्या सही कर रहा है और क्या गलत। जब तक मन की आंखें बंद हैं, तब तक व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर पाता।
“कर्मों का फल सामने दिखाई देने के बावजूद यदि अंतर की आंखें नहीं खुलें तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।” आचार्यश्री ने आत्मचिंतन को जीवन का आवश्यक हिस्सा बताया।
जैसा बोलेंगे, वैसा ही सुनना पड़ेगा
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जैसा बोलता है, उसे वैसा ही सुनना भी पड़ता है। समाज में सम्मानित और जिम्मेदार लोगों को अपनी भाषा और मर्यादा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि माता-पिता या गुरु ही गलत भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो बच्चे उनसे क्या सीखेंगे?
उन्होंने कहा कि संस्कार केवल किताबों से नहीं आते, बल्कि घर, समाज और गुरुजनों के व्यवहार से बच्चों तक पहुंचते हैं। इसलिए बड़ों की जिम्मेदारी है कि वे अपने आचरण से नई पीढ़ी के सामने आदर्श प्रस्तुत करें।
जीवों को मारने का हमें कोई अधिकार नहीं
आचार्यश्री ने जीव दया का संदेश देते हुए कहा कि पशु-पक्षियों को मारने का मनुष्य को कोई अधिकार नहीं है। केवल अपनी भूख या स्वाद के लिए किसी जीव की हत्या करना उचित नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि पापी पेट के लिए जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए। जो जीवों को पीड़ा देते हैं, उन्हें अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से करुणा, दया और अहिंसा को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
नेत्रदान पखवाड़े के पोस्टर-बैनर का विमोचन
दैनिक सत्संग के दौरान आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान के भीलवाड़ा चैप्टर की ओर से नेत्रदान जागरूकता अभियान के तहत मनाए जा रहे नेत्रदान पखवाड़े के पोस्टर एवं बैनर का विमोचन किया।
इस अवसर पर आचार्यश्री ने कहा कि नेत्रदान केवल एक पखवाड़े तक चलने वाला अभियान नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समाज की स्थायी सेवा भावना बनाना चाहिए। उन्होंने लोगों से मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करने का संकल्प लेने की अपील की।
रामस्नेही चिकित्सालय के रतन दरगड़ ने चिकित्सालय में उपलब्ध नेत्र संबंधी सुविधाओं की जानकारी दी। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिष्ठा ने नेत्रदान कौन कर सकता है, नेत्रदान की प्रक्रिया क्या है और इसका सामाजिक महत्व क्या है, इसकी जानकारी श्रद्धालुओं को दी।
प्रवचन के बाद कई श्रद्धालुओं ने नेत्रदान के संकल्प पत्र भरकर इस पुनीत अभियान से जुड़ने की इच्छा जताई।
मानस प्रवचन से लेकर भक्तमाल तक गूंज रहा राम नाम
मुख्य प्रवचन से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की।
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक दैनिक सत्संग हो रहा है। इससे पूर्व सुबह 8.30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ किया जा रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल कथा का आयोजन भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन सत्संग और धार्मिक आयोजनों में पहुंचकर आध्यात्मिक लाभ ले रहे हैं। चातुर्मास में जहां राम नाम की ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना रही है, वहीं आचार्यश्री का नेत्रदान और जीव दया का संदेश समाज को यह याद दिला रहा है कि जीवन की असली रोशनी केवल आंखों में नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और सद्भावना में बसती है।




