
आज भी रामनिवास धाम से पूरे विश्व में गूंज रही है उनकी अणभैवाणी, फूलडोल महोत्सव और राम-नाम की अनवरत धारा
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
“निर्गुण भक्ति चहुं दिशि नहीं, नहीं राम का जाप।
जिनकूं परगट करन कूं, आये आपों आप।।”
रामस्नेही संप्रदाय के आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी श्री रामचरणजी महाराज के जीवन का यही सार है। भारतीय संत परंपरा में जब भी धर्म संकट में पड़ा, समाज अंधविश्वास, आडंबर और पाखंड में उलझा, तब किसी न किसी महापुरुष ने अवतार लेकर मानवता को नई दिशा दी। अठारहवीं शताब्दी का भारत भी कुछ ऐसा ही दौर देख रहा था। मुगल सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी, राजघरानों में सत्ता संघर्ष चरम पर था, समाज रूढ़ियों और धार्मिक आडंबरों से जकड़ा हुआ था। ऐसे संक्रमण काल में राजस्थान की धरती पर एक ऐसे संत का उदय हुआ, जिसने राम-नाम को ही जीवन का सबसे बड़ा साधन बनाकर आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात किया। वही संत आगे चलकर रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के नाम से विश्वविख्यात हुए।
मालपुरा के समीप सोड़ा में हुआ दिव्य अवतरण
महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज का जन्म माघ शुक्ल चतुर्दशी, संवत 1776 (शनिवार) को जयपुर राज्य के मालपुरा के निकट स्थित सोड़ा ग्राम में अपने ननिहाल में हुआ। उनके पिता बख्तरामजी और माता देऊजी धार्मिक एवं संस्कारित परिवार से थे। उनका बाल्यकाल का नाम रामकिशन था। जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बालक असाधारण तेजस्वी होगा और आगे चलकर समाज का मार्गदर्शन करेगा।
बाल्यावस्था से ही रामकिशन अत्यंत मेधावी, शांत और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। सांसारिक वैभव के बीच भी उनका मन अध्यात्म की ओर अधिक आकर्षित रहता था। उनका विवाह चांदसेन ग्राम में गुलाब कंवर बाई के साथ हुआ और पारिवारिक जीवन भी प्रारंभ हुआ, किंतु नियति ने उनके लिए कुछ और ही निर्धारित कर रखा था।
राजकीय वैभव छोड़ा, चुना वैराग्य का मार्ग
ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार रामकिशनजी ने जयपुर रियासत में उच्च प्रशासनिक पद पर कार्य किया। अनेक विद्वान उन्हें तत्कालीन राज्य का दीवान भी बताते हैं। न्यायप्रियता, निष्पक्षता और प्रशासनिक दक्षता के कारण वे राजा और प्रजा दोनों के प्रिय थे।
लेकिन एक दिन जीवन ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। ससुराल प्रवास के दौरान एक विरक्त योगी ने उनके चरणों की रेखाएँ देखकर कहा— “यह पुरुष या तो महान सम्राट बनेगा या फिर संसार का पूज्य संत।” उसी रात एक स्वप्न ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने देखा कि तेज बहती नदी में वे डूब रहे हैं और एक तेजस्वी महात्मा उनका हाथ पकड़कर उन्हें बाहर निकाल लेते हैं। जागने के बाद वह स्वप्न उनके मन में गहराई तक उतर गया। सांसारिक वैभव उन्हें निरर्थक लगने लगा और उन्होंने सब कुछ त्यागकर उस दिव्य महात्मा की खोज का निश्चय कर लिया।

दांतड़ा में मिली गुरु कृपारामजी की शरण
संवत 1808 में रामकिशनजी घर-परिवार, पद और प्रतिष्ठा का त्याग कर दक्षिण दिशा की ओर निकल पड़े। अनेक स्थानों से होते हुए वे शाहपुरा के निकट दांतड़ा पहुँचे, जहाँ उन्हें वही तेजस्वी महात्मा मिले जिन्हें उन्होंने स्वप्न में देखा था। वे थे स्वामी श्री कृपारामजी महाराज।
गुरु कृपारामजी ने पहले उनकी कठोर परीक्षा ली। वैराग्य मार्ग की कठिनाइयों से अवगत कराया, वापस गृहस्थ जीवन में लौट जाने की सलाह भी दी। लेकिन रामकिशनजी का संकल्प अटल था। अंततः भाद्र शुक्ल सप्तमी, संवत 1808 को उन्हें दीक्षा प्रदान की गई और उनका नया नाम रखा गया— रामचरण। यहीं से भारतीय संत परंपरा में एक नए अध्याय का आरंभ हुआ।
सात वर्षों की कठोर तपस्या ने बनाया युगदृष्टा
दीक्षा के पश्चात स्वामी रामचरणजी महाराज ने सात वर्षों तक कठोर साधना, मौन तप और निरंतर राम-नाम का जाप किया। उन्होंने त्याग को जीवन का आभूषण बनाया। कहा जाता है कि एक बार एक रसायनविद् ने उन्हें तांबे को सोना बनाने की विद्या देने का प्रस्ताव रखा। स्वामीजी मुस्कुराए और बोले— “हमें तो राम-रसायन मिल चुका है, अब संसार का कोई स्वर्ण हमें आकर्षित नहीं कर सकता।”
यही विरक्ति आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश बनी।
भीलवाड़ा से उठी राम-नाम की गंगा
गुरु आज्ञा से स्वामी रामचरणजी महाराज भीलवाड़ा पहुँचे। उस समय समाज मूर्तिपूजा, बाह्य आडंबर और कर्मकांडों में उलझा हुआ था। उन्होंने नगर के पश्चिम में मियाचंदजी की बावड़ी की एक गुफा को साधना स्थल बनाया। वहीं बैठकर निरंतर राम-नाम का स्मरण और आध्यात्मिक चिंतन करते रहे।
धीरे-धीरे लोगों ने उनके त्याग, तप और तेजस्वी व्यक्तित्व को पहचाना। उनके चारों ओर श्रद्धालुओं का समूह बढ़ने लगा। यहीं उन्होंने अपनी अमर कृति ‘अणभैवाणी’ की रचना की, जिसमें लगभग 36 हजार से अधिक पद संकलित हैं। आज भी रामस्नेही संप्रदाय के प्रत्येक रामद्वारे में प्रतिदिन अणभैवाणी का पाठ होता है। इसे कलियुग में मानव मन का शुद्धिकरण करने वाली आध्यात्मिक गंगा माना जाता है।
विरोध, विष और षड्यंत्र भी नहीं डिगा सके
इतिहास बताता है कि सत्य का मार्ग कभी सरल नहीं होता। स्वामी रामचरणजी महाराज की बढ़ती लोकप्रियता से कुछ लोग ईर्ष्यालु हो उठे। उन्हें विष देने का प्रयास किया गया, तलवारों और लाठियों से हमले हुए, लेकिन हर बार वे सुरक्षित रहे। उनके विरोधियों के सभी प्रयास विफल हो गए।
उदयपुर के महाराणा तक शिकायतें पहुँचीं, लेकिन जब वास्तविकता सामने आई तो विरोध शांत हो गया। यह उनकी निष्कलंक साधना और चरित्र की सबसे बड़ी विजय थी।
शाहपुरा बना रामस्नेही संप्रदाय की विश्वपीठ
संवत 1826 में स्वामी रामचरणजी महाराज शाहपुरा आए। तत्कालीन शासक राजा रणसिंहजी ने उनका भव्य स्वागत किया और राजपरिवार की छतरियों के समीप उनके लिए साधना स्थल उपलब्ध कराया। यही स्थान आगे चलकर श्रीरामनिवास धाम बना, जो आज विश्वभर के रामस्नेहियों की सर्वोच्च पीठ है।
शाहपुरा में रहते हुए उन्होंने राम-नाम, समानता और मानवता का ऐसा संदेश दिया कि राजा और रंक एक ही पंक्ति में बैठकर उनके प्रवचन सुनने लगे। उन्होंने जाति, ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभाव को नकारते हुए सभी को एक ही ईश्वर की संतान बताया।

फूलडोल महोत्सव की अमर परंपरा
भीलवाड़ा में प्रारंभ हुई फूलडोल महोत्सव की परंपरा शाहपुरा आकर और अधिक भव्य होती गई। कहा जाता है कि जब भक्तों ने उत्सव मनाया तो देवताओं ने पुष्पवृष्टि की। तभी महाप्रभु ने इस आयोजन का नाम ‘फूलडोल’ रखा।
आज लगभग ढाई शताब्दी बाद भी यह महोत्सव उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ आयोजित होता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शाहपुरा पहुँचते हैं और राम-नाम की इस अनूठी परंपरा के साक्षी बनते हैं।
राम-नाम के साथ हुआ महाप्रस्थान
वैशाख कृष्ण पंचमी, संवत 1855 को शाहपुरा में ही महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज ब्रह्मलीन हुए। जनश्रुति है कि अंतिम क्षणों तक उनके अधरों पर “राम… राम…” का उच्चारण होता रहा। उनके अंतिम संस्कार के समय उनके शरीर पर ओढ़ा गया कंबल अग्नि में भी सुरक्षित रहा। वह पवित्र धरोहर आज भी रामनिवास धाम में सुरक्षित है और फूलडोल महोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखी जाती है।
आज भी शाहपुरा का रामनिवास धाम, अणभैवाणी की अमृतधारा, फूलडोल महोत्सव की परंपरा और विश्वभर में फैला रामस्नेही संप्रदाय महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के तप, त्याग और लोककल्याण की अमिट स्मृति को जीवंत बनाए हुए है। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, समाज बदला, लेकिन राम-नाम की वह ज्योति, जिसे महाप्रभु ने प्रज्ज्वलित किया था, आज भी उतनी ही उज्ज्वलता से मानवता का पथ आलोकित कर रही है।





