Welcome to शाहपुरा संवाद   Click to listen highlighted text! Welcome to शाहपुरा संवाद
BHILWARAE-Paperधर्मराजस्थानरामस्नेहीलोकल न्यूज़शाहपुरा

‘सामाजिक समरसता का अभियान हमारी राखी है’—कविताओं में गूंजी राष्ट्रभक्ति और सामाजिक चेतना

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की मासिक गोष्ठी में रचनाकारों ने कविता के माध्यम से उठाए राष्ट्र, समाज और शिक्षा से जुड़े ज्वलंत मुद्दे

शाहपुरा। साहित्य केवल शब्दों की सजावट नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली वह मशाल है, जो अंधेरे दौर में भी चेतना का प्रकाश फैलाती है। जब कविता में राष्ट्रभक्ति का स्वर उठता है तो वह महज रचना नहीं रहती, बल्कि समाज के अंतर्मन को झकझोरने वाला संदेश बन जाती है। इसी भावभूमि के साथ अखिल भारतीय साहित्य परिषद, शाहपुरा की मासिक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन केशव प्रन्यास भवन, संघ कार्यालय शाहपुरा में हुआ। गोष्ठी में सामाजिक समरसता, राष्ट्रभक्ति, आजादी के मायने, शिक्षा व्यवस्था और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों जैसे विषयों पर रचनाकारों ने अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम से विचार रखे।

गोष्ठी की अध्यक्षता तेजपाल उपाध्याय ने की, जबकि डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ मुख्य अतिथि रहे। साहित्यकारों और रचनाप्रेमियों की मौजूदगी में आयोजित इस गोष्ठी ने कविता, व्यंग्य और विचारों के माध्यम से साहित्य की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया।

परिषद गीत से हुआ साहित्यिक संध्या का आगाज

गोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने परिषद गीत “भारती की लोकमंगल साधना साकार हो” से किया। गीत के माध्यम से राष्ट्र और समाज के कल्याण की भावना को स्वर मिला। इसके बाद एक के बाद एक रचनाकारों ने अपनी रचनाओं से साहित्यिक वातावरण को विचारों और संवेदनाओं से भर दिया।

डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने अपनी प्रभावशाली कविता “सामाजिक समरसता का अभियान हमारी राखी है” प्रस्तुत कर समाज में भाईचारे, समानता और एकता का संदेश दिया। कविता ने सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर समरस समाज के निर्माण की आवश्यकता को रेखांकित किया।

व्यवस्था और उपद्रव पर कविता के जरिए प्रहार

गोपाल लाल पंचोली ने अपनी रचना “हाथों में सरिया लाठी ले उत्पात मचा रहे हो” के माध्यम से आजादी के नाम पर उपद्रव और हिंसा करने वालों पर तीखा प्रहार किया। रचना में स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ और उसके साथ जुड़ी जिम्मेदारियों पर सवाल खड़े किए गए।

वहीं सोमेश्वर व्यास ने हास्य-व्यंग्य की रचना “गरीबदास ने मुझे चाय पर बुलाया” सुनाकर गंभीर साहित्यिक माहौल में हास्य का रंग घोला। उनकी प्रस्तुति पर श्रोता जमकर हंसे और गोष्ठी का वातावरण कुछ देर के लिए ठहाकों से गूंज उठा।

‘राम को छोड़कर तुम कहां जाओगे…’ ने जगाई आध्यात्मिक चेतना

डॉ. कमलेश पाराशर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आध्यात्मिकता और राष्ट्र चिंतन को सामने रखा। उन्होंने “राम को छोड़कर तुम कहां जाओगे, जहां जाओगे वहीं राम को पाओगे” रचना सुनाकर जीवन में आध्यात्मिक चेतना और रामत्व के भाव को रेखांकित किया।

इसके साथ ही उन्होंने “80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, क्या खो रहे हैं, क्या पा रहे हैं यह नहीं बता रहे हैं” रचना के माध्यम से स्वतंत्रता के दशकों बाद भी देश और समाज की उपलब्धियों तथा चुनौतियों पर आत्ममंथन का संदेश दिया।

भारत मां की आराधना से लेकर आजादी के मायनों तक

ओम माली ‘अंगारा’ ने अपनी रचनाओं में प्रेम और राष्ट्रभक्ति के भावों को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने “पूरे दिवस प्रतीक्षारत व्याकुल रजनी करती रही इंतजार प्रियतम चंद्र का” तथा “भारत मां तेरे चरणों में अर्पण हो जीवन हमारा” रचनाएं प्रस्तुत कीं। उनकी कविताओं में भावनात्मक संवेदना के साथ राष्ट्र के प्रति समर्पण का स्वर सुनाई दिया।

गोविंद सिंह बड़गुर्जर ने “मेरी प्यारी भारत मां तेरी जय जय जय हो” के माध्यम से राष्ट्रभक्ति की भावना को स्वर दिया। वहीं उनकी दूसरी रचना “आजादी का जश्न मनाने से, घर-घर तिरंगा फहराने से क्या सचमुच में आजादी आई है” ने श्रोताओं को आजादी के वास्तविक अर्थ और वर्तमान परिस्थितियों पर सोचने के लिए मजबूर किया।

बलिदानियों के सपनों को साकार करने का आह्वान

गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे तेजपाल उपाध्याय ने साहित्य और राष्ट्र निर्माण के संबंध पर गंभीर विचार रखे। उन्होंने कहा कि देश आजाद होने के बाद बलिदानियों के सपनों को भुलाकर सत्ताधारी लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति में लग गए। भारतीय चिंतन और साहित्य के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ तथा मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को ही जारी रखा गया।

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि स्वतंत्रता सेनानियों और बलिदानियों के सपनों को साकार करने की दिशा में ठोस प्रयास हों। देश की शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में भी आवश्यक बदलाव किया जाना जरूरी है। साहित्यकारों को भी अपनी कलम के माध्यम से समाज में चेतना और सकारात्मक परिवर्तन की अलख जगानी चाहिए।

साहित्य बना आत्ममंथन का आईना

गोष्ठी के दौरान प्रस्तुत रचनाओं में कहीं सामाजिक समरसता का संदेश था तो कहीं राष्ट्रभक्ति की हुंकार। कहीं हास्य-व्यंग्य के माध्यम से व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया तो कहीं आजादी के वास्तविक अर्थ पर गंभीर सवाल उठाए गए। इस तरह पूरी साहित्यिक गोष्ठी समाज और राष्ट्र के प्रति साहित्यकार की जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बन गई।

गोष्ठी की समीक्षा डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने की। उन्होंने प्रस्तुत रचनाओं के भाव, कथ्य और सामाजिक सरोकारों पर विचार व्यक्त करते हुए साहित्यकारों का मार्गदर्शन किया।

समापन के साथ यह साहित्यिक आयोजन अपने पीछे एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ गया—साहित्य की सार्थकता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उन शब्दों से पैदा होने वाली सामाजिक चेतना में है। सामाजिक समरसता, राष्ट्रभक्ति और व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की आवाज जब साहित्य के मंच से उठती है, तो वह निश्चित रूप से समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचने की क्षमता रखती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!