
शाहपुरा, रक्षाबंधन का त्योहार सिर्फ भाई की कलाई पर बंधने वाले एक धागे का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों की भावनाओं, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का उत्सव है। लेकिन जब यही राखी देश की सीमाओं पर तैनात उस भाई तक पहुंचे, जो हजारों किलोमीटर दूर रहकर देश की हिफाजत में दिन-रात डटा है, तो उसका अर्थ और भी गहरा हो जाता है। शाहपुरा में कुछ ऐसा ही भावनात्मक और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत प्रयास देखने को मिला।
भारतीय डाक के ‘राखी से रक्षा अभियान’ के तहत रक्षाबंधन के अवसर पर शाहपुरा से देश की सीमाओं पर तैनात वीर सैनिक भाइयों के लिए 51 राखियां डाक के माध्यम से भेजी गईं। इन राखियों के साथ सिर्फ धागे नहीं, बल्कि बहनों का स्नेह, शुभकामनाएं, सम्मान और पूरे देश की ओर से जवानों के प्रति कृतज्ञता भी सरहद तक भेजी गई है।
कुंडगेट डाकघर से रवाना हुआ बहनों का स्नेह
शाहपुरा उप डाकघर कुंडगेट के डाकपाल प्रवीण कुमार रेगर के समन्वय से दीपिका वैष्णव एवं मोनिका सोनी ने 51 राखियां भारतीय डाक के माध्यम से सैनिक भाइयों तक पहुंचाने के लिए भेजीं।
राखियां भेजते समय दोनों के मन में उत्साह के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव भी नजर आया। आखिर जिन भाइयों की कलाई पर राखी बंधनी थी, वे अपने घर-परिवार से दूर देश की सीमा पर राष्ट्र की सुरक्षा में तैनात हैं। उनके लिए भेजी गई प्रत्येक राखी यह संदेश देने वाली है कि भले ही बहनें उनसे दूर हों, लेकिन देश का हर नागरिक उनके साथ खड़ा है।
राखी के धागे में छिपा है देश का सम्मान
दीपिका वैष्णव एवं मोनिका सोनी ने कहा कि देश की रक्षा के लिए अपने परिवारों से दूर रहकर सीमाओं पर तैनात वीर जवानों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करना हम सभी का दायित्व है। राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और भावनाओं का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि सैनिक भाइयों तक राखी पहुंचाकर उन्हें यह अहसास कराने का प्रयास किया गया है कि वे सरहद पर अकेले नहीं हैं। उनके पीछे पूरा देश खड़ा है। देशवासी उनके साहस, त्याग और समर्पण को नमन करते हैं।
एक तरफ बहनों की कलाई, दूसरी तरफ जवानों की ड्यूटी
रक्षाबंधन के दिन आमतौर पर घरों में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। भाई बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं और परिवार में खुशियों का माहौल रहता है। मगर सरहद पर तैनात जवानों के लिए त्योहारों का अर्थ कुछ अलग होता है।
जब देश के अधिकांश परिवार त्योहार मना रहे होते हैं, तब भी जवान अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद रहते हैं। उनकी प्राथमिकता परिवार से पहले राष्ट्र की सुरक्षा होती है। ऐसे में किसी अनजान बहन की भेजी राखी जब उनकी कलाई तक पहुंचती है तो वह उन्हें घर-परिवार और देशवासियों के भावनात्मक जुड़ाव का अहसास कराती है।
यही कारण है कि ‘राखी से रक्षा अभियान’ केवल डाक विभाग की एक पहल नहीं, बल्कि समाज और सेना के बीच भावनात्मक सेतु बनाने वाला अभियान बन गया है।
डाक विभाग बना स्नेह का संदेशवाहक
इस पहल में भारतीय डाक विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। डाक के माध्यम से शाहपुरा की बहनों की राखियां अब उन जवान भाइयों तक पहुंचेंगी, जो देश की सीमाओं की सुरक्षा में तैनात हैं।
चेतन वैष्णव और अभिषेक सोनी ने भारतीय डाक के ‘राखी से रक्षा अभियान’ की सराहना करते हुए कहा कि डाक विभाग के माध्यम से देश की बहनों का स्नेह सीधे सरहद पर तैनात वीर जवानों तक पहुंच रहा है। यह पहल भावनाओं को दूरी की सीमाओं से पार ले जाने का काम कर रही है।
51 राखियां, मगर भावनाएं हजारों
शाहपुरा से भेजी गई 51 राखियों की संख्या भले ही छोटी लगे, लेकिन इनके पीछे छिपी भावनाएं बहुत बड़ी हैं। हर राखी में एक बहन का स्नेह है, किसी परिवार की शुभकामना है और उस सैनिक के प्रति सम्मान है, जो अपने कर्तव्य के लिए परिवार से दूर है।
इन राखियों के साथ मानो शाहपुरा की बहनों ने सरहद पर तैनात जवानों से कहा है—“आप देश की रक्षा के लिए सीमा पर खड़े हैं, इसलिए हम अपने घरों में सुरक्षित हैं। आपकी कलाई तक पहुंचने वाली यह राखी हमारे स्नेह के साथ पूरे देश की ओर से सम्मान का धागा है।”
रक्षाबंधन के अवसर पर शाहपुरा से निकला यह स्नेह संदेश एक बार फिर याद दिलाता है कि देश की सीमाएं केवल सैनिकों के साहस से सुरक्षित नहीं रहतीं, बल्कि देशवासियों के सम्मान, विश्वास और भावनात्मक समर्थन से भी मजबूत होती हैं। सरहद पर बंदूक थामे जवान की कलाई पर जब शाहपुरा की बहन की राखी बंधेगी, तब उस धागे में भाई-बहन के रिश्ते के साथ पूरा राष्ट्र एक भाव में बंधा नजर आएगा।




